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गुरुवार, अक्टूबर 18, 2012

ऐतिहासिक तारादेवी मन्दिर

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शिमला के निकट बना ऐतिहासिक तारादेवी मन्दिर देश के ऐसे स्थलों में शामिल है जिसे भारत के देवी स्थानों में अत्यन्त महत्व प्राप्त है। वस्तुतः भगवती तारा क्योंथल राज्य के सेन वंशीय राजाओं की कुलदेवी हैं। क्योंथल रियास
त की स्थापना राजा गिरिसेन ने की थी। इसलिए संक्षेप में सेन राजवंश का इतिहास जानना भी आवश्यक है। मध्यकालीन भारत में छोटे-छोटे राज्य हुआ करते थे। उत्तरी भारत में अनेक राजपूत रियासतें थीं जिनमें दिल्ली में तोमर, अजमेर में चौहान, कन्नौज में राठौर, बुन्देलखण्ड में चन्देल, मालवा में परमार, गुजरात में चालुक्य, मेवाड़ में सिसोदिया, बिहार में पाल तथा बंगाल में सेन राजवंश प्रमुख थे। महमूद गज़नवी के बाद शहबद्दीन मुहम्मद गौरी ने भारत पर बार-बार आक्रमण किए। वह कट्टर मुसलमान था और भारत में मूर्तिपूजा का नाश करना तथा मुस्लिम राज्य की स्थापना करना अपना सबसे बड़ा कर्त्तव्य समझता था। वह राजाओं की शक्ति को नष्ट-भ्रष्ट करना चाहता था। उसके एक सेनानायक मुहम्मद-बिन-बख़तियार खिलजी ने जब बंगाल की राजधानी नदिया पर आक्रमण किया तो वहां के तत्कालीन सेन राजवंशीय राजा लक्ष्मणसेन को लाचार होकर अपना राज्य छोड़ना पड़ा और वे राजपरिवार सहित ढाका की ओर विक्रमपुर चले गए। कहा जाता है कि उन्हें उनेक राजज्योतिषी ने पहले ही यह बता दिया था कि वे किसी भी प्रकार से तुर्क आक्रमणकारियों का सामना नहीं कर पाएंगें। कालान्तर में उनके प्रपौत्र राजा रूपसेन को भी विक्रमपुर छोड़ना पड़ा और वे पंजाब प्रान्त के रोपड़ में आकर बस गए। मुसलमान आक्रमणकारियों से वहां भी उन्हें युद्ध लड़ने के लिए विवश होना पड़ा। अंत में उनके तीनों पुत्र पर्वतीय क्षेत्रों की ओर चल पड़े, जिनमें से वीरसेन ने सुकेत, गिरिसेन ने क्योंथल तथा हमीरसेन ने किश्तवाड़ की ओर प्रस्थान किया।
राजा गिरिसेन ने जुनगा को अपने राज्य की राजधानी बनाया। कुलदेवी होने के नाते वे भगवती तारा को भी (मूर्ति रूप में) अपने साथ ही लाए थे। सेनवंश के सभी राजाओं तथा राजपरिवार पर भगवती तारा की असीम कृपा रही है। संकट की घड़ी में भगवती तारा ने हर प्रकार से उनकी सहायता की है।

एक बार अपने राज्यकाल में तत्कालीन क्योंथल रियासत (जुनगा) के राजा भूपेन्द्र सेन जुग्गर के घने जंगल में शिकार खेलने पहुंचे। उन्हें वहां पहुंचे कुछ ही समय हुआ था कि सहसा उन्हें उस स्थान पर भगवती तारा की विद्यमानता का आभास हुआ। भगवती ने आवाज+ देकर कहा- ''हे राजन्‌! तुम्हारी वंश परम्परा बंगाल से चली आ रही है। मैं दश महाविद्याओं में से एक महाविद्या हूँ।'' इस आवाज़ को सुनकर राजा आश्यर्चचकित हो गए और हने लगे- ''हे माता! यदि यह आवाज़ वास्तव में आपकी ही है, तो साक्षात्‌ रूप में प्रकट होकर दर्शन देकर कृतार्थ करो।'' राजा के इस प्रकार कहने पर माता ने साक्षात्‌ दर्शन दिए और कहा- ''राजन्‌! तुम मेरे स्थान का निर्माण करो। मैं सदैव तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारे वंश तथा राज्य की रक्षा करूंगी।'' ऐसा कहकर उसी क्षण भगवती अदृश्य हो गईं।

भगवती के इस प्रत्यक्ष चमत्कार से प्रभावान्वित होकर राजा भूपेन्द्र सेन ने भगवती के आदेशानुसार वहां एक मन्दिर का निर्माण करवाया तथा उस मन्दिर में भगवती तारा की मूर्ति को प्रतिष्ठापित करवाया। साथ ही एक बड़ा भूक्षेत्र भी मन्दिर के नाम दान कर दिया। यहां भगवती तारा प्रत्यक्ष रूप में स्वयं प्रकट हुई थीं। इस कारण यह प्रमुख स्थान माना जाता है। पूर्व काल में इस मन्दिर में विधिवत्‌ पूजा हुआ करती थी। इस कार्य के लिए एक पुजारी को यहां नियुक्त किया गया था। उसके बाद उसके वंशज पूजा-अर्चना का कार्य किया करते थे। परन्तु किसी कारणवश एक ऐसा समय आया कि धीरे-धीरे उक्त परिवार का प्रायः अन्त हो गया और यहां की सारी व्यवस्था में व्यवधान पड़ गया। मन्दिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच गया।
परन्तु श्रद्धालुओं के लिए यह प्रसन्नता का विषय है कि कुछ समय पूर्व ही श्री तारादेवी मन्दिर न्यास ने स्थानीय लोगों के प्रशंसनीय योगदान से इस स्थान पर एक नए मन्दिर का निर्माण करवाया है। मन्दिर की वास्‍तुशैली भी आकषर्क है। जुग्गर मन्दिर शिलगांव चक के अन्तर्गत आता है। इसलिए वहां के निवासी ही मुख्यरूप से वर्षों से इस मन्दिर की देख-रेख तथा कार्यभार के उत्तरदायित्व को निभाते चले आ रहे हैं। छठे महीने अर्थात्‌ वर्ष में दो बार ये सभी लोग मिलजुल कर इस मन्दिर में विशेष पूजा-अर्चना तथा कड़ाही-प्रसाद की व्यवस्था करते हैं। ये सभी लोग इस बात को भी मानते हैं कि भगवती कृपा सदैव इन पर बनी रहती है।

एक समय महात्मा ताराधिनाथ नामक एक सिद्ध योगी घूमते-घुमाते तारब के जंगल में पहुंच गए। उन्होंने सांसारिक बन्धनों का त्योग कर दिया था। अभीष्ट सिद्धि की प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या तथा योगशक्ति के बल पर उन्होंने अलौकिक शक्तियों से सामंजस्य स्थापित कर लिया था। वे भगवती तारा के अनन्य उपासक थे। वे इस जंगल के उच्च शिखर पर अपने आगे धूनी लगाकर अपने आसन पर ध्यानमुद्रा में बैठे रहा करते थे। जब वर्षा होती थी तो एक बूँद भी उनकी धूनी तथा उनके आसन पर नहीं गिरती थी। वह स्थान को वर्षा से अप्रभावित रहा करता था। जो लोग भी वहां जाते थे, वे इस चमत्कार को देखकर अचम्भित होते थे।

श्री तारादेवी मन्दिर में 7 अगस्त, 1970 को एक बहुत ही निन्दनीय घटना घटित हुई। अर्धरात्रि के समय कुछ लुटेरों ने मन्दिर के द्वार को तोड़कर गर्भगृह में प्रवेश किया। भगवती तारा की मूर्ति को उठाकर वे भागने लगे। वे कुछ ही दूरी तक मूर्ति को ले जा सके थे कि उनका दम घुटने लगा। उनकी आंखों के आगे अन्धेरा छा गया। उन्हें आगे जाने का रास्ता नहीं सूझा। भगवती की अद्भुत शक्ति ने लुटेरों के इस नीचतापूर्ण दुष्कृत्य को विफल कर दिया। विवश होकर उन लुटेरों ने भगवती की मूर्ति को एक बड़ी झाड़ी के बीच फैंक कर छोड़ दिया और वे स्वयं रात्रि के अंधेरे का लाभ उठाकर भाग निकले।

क्योंथल राजवंश की अपनी कुलदेवी भगवती तारा के प्रति अटूट श्रद्धा है। वे समय-समय पर अपने कल्याणार्थ तथा सर्वजनहितार्थ श्री तारादेवी मन्दिर में अनुष्ठान करवाते रहते हैं।

श्री तारादेवी मन्दिर में आने वाले श्रद्धालुओं में से अनेक ऐसे भी हैं, जो भगवती का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए अथवा मांगी गई मन्नत पूरी होने पर दूर-दूर से नंगे पावं पैदल चलकर यहां पहुंचते हैं।

वस्तुतः भगवती सम्पूर्ण जगत की अधीश्वरी हैं। वे अपने भक्तों की रक्षा तथा कल्याण के लिए ही प्रकट रूप में इस मन्दिर में निवास करती हैं।

बुधवार, अगस्त 22, 2012

जिजीविषा हार गई

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जिजीविषा
हार गई
वो सह नहीं पाई
निरन्‍तर दौड़ना
प्रतीक्षा करना
डायलसिस की वेदना
अनावश्‍यक डांट
जिजीविषा 
सह गई
अमानवीय व्‍यवहार
और
यम
जीत गया,
जिजीविषा
हार गई
और सो गई
सदा के लिए।





रविवार, अगस्त 19, 2012

जिजीविषा

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जिजीविषा
निरन्‍तर दौड़ती रहती है
कभी सीढि़यो पर
उतरते चढ़ते ,
वार्ड में प्रतीक्षा करते
स्‍ट्रेचर पर लेटे
व्‍हील चेयर पर
और
आप्रेशन थियेटर में,
जिजीविषा
 निरन्‍तर देखती रहती है
सिरंज में बूंद बूंद रक्‍त
और
सह लेती है
डायलसिस की वेदना,
 नर्सो की
अनावश्‍यक डांट,

जिजीविषा
महाप्रस्‍थान कभी नहीं चाहती
वो कहती है
यम से
तुम ज़रा
रूकों
अभी बहुत काम करने है मुझे ।





शुक्रवार, जुलाई 27, 2012

लोक गायिका गंभरी देवी को टैगोर सम्मान

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खाणा-पीणा नंद लेणी ओ गंभरीए’ गीत की धुनों पर नृत्य व गायकी से दर्शकों को झुमाने वाली हिमाचल की प्रख्यात लोक गायिका गंभरी देवी को राष्ट्रीय अकादमी द्वारा वर्ष 2011-12 का टैगोर सम्मान प्रदान किया गया है। उन्हें यह सम्मान हिमाचल के लोक संगीत में दिए गए अतुल्य योगदान के लिए दिया गया है। राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादमी की ओर से रवींद्रनाथ ठाकुर की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय स्तर पर 50 टैगोर सम्मान घोषित किए गए । इनके लिए विभिन्न प्रदेशों से ऐसे कलाकारों के नाम कृतित्व विवरण सहित मंगवाए गए थेजिनकी आयु 75 वर्ष से अधिक हो। 50 टैगोर सम्मानों में से लोक संगीत की विद्या में देश के 13 कलाकारों को यह पुरस्कार दिया गया है,  जिनमें हिमाचल की कोकिला गंभरी देवी भी शामिल है। इस सम्मान में उन्हें एक लाख रुपएताम्रपत्र व अंग वस्त्र दिया गया है। लोक गायिका गंभरी देवी के गीत आज भी हिमाचलवासियों की जुबान पर गूंजते हैं। प्रदेश का हर संगीत प्रेमी उनकी मखमली आवाज का कायल है। 91 वर्षीय हिमाचली लोक गायिका का खुद ही गीत रचती है। खुद ही उसकी धुन बनाती हैं और उस पर नृत्य करती हैं। उनकी इस प्रतिभा को देखते हुए उन्हें इस सम्मान से नवाजा गया है। हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी के सचिव डा. तुलसी रमण ने कहा कि लोक गायिका गंभरी को यह पुरस्कार मिलना हिमाचल प्रदेश के लिए गौरव की बात है। टैगोर सम्मान पिछले दिनों कोलकाता तथा चेन्नई में आयोजित समारोह में दिए गए हैंलेकिन किन्ही कारणों से गम्भरी देवी वहां नहीं पहुंच सकी थीं। इसी कारण संगीत नाटक अकादमी की ओर से जारी पत्र सहित यह पुरस्कार हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी के पास दस्ती भेजा गया हैजो पुरस्कार जल्द ही लोक गायिका गम्भरी देवी को प्रदान किया जाएगा।  हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी की ओर से भी उन्हें लोक संगीत के लिए वर्ष 2001 का हिमाचल अकादमी कला सम्मान’ प्रदान किया गया था।

गुरुवार, जुलाई 12, 2012

श्रीखंड यात्रा 2012

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श्रीखंड यात्रा इस बार 16 जुलाई से 23 जुलाई तक आयोजित होगी।  श्रीखंड जिला कुल्लू के दुर्गम क्षेत्र से लगभग 1800 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।
 इस स्थान पर पहुंचने के लिए शिमला से रामपुर, रामपुर से निरमंड व बागीपुल तक बस से पहुंचा जा सकता है।  निरमंड से 4 कि.मी. पीछे  उतर कर देवढांक में महादेव के दर्शन कर लिए जाएं तो श्रीखंड महादेव की यात्रा सफल हो जाती है। यहां से अपनी यात्रा शुरू करनी चाहिए। रात्रि विश्राम बागीपुल में किया जा सकता है। जांव गांव में महामाया का एक बहुत ही पुराना भव्य मंदिर है। जांव गांव में थोड़ा विश्राम करके सिंहगाड तक आराम से पगडंडी द्वारा रास्ता तय करके पहुंचा जा सकता है। बागीपुल से सिंहगाड का रास्ता 9 कि.मी. है। इसके बाद यात्री थाचडू के लिए प्रस्थान करते हैं और फिर बराहटीनाला में गिरचादेव के दर्शन करके आगे की यात्रा शुरू करते हैं और अगला पडाव भीमडुआरी है। यहां घने जंगल व बर्फ से लदे पहाड़ देख कर मन मोहित हो जाता है। थाचडू से भी सुबह-शाम अगर मौसम साफ हो तो श्रीखंड महादेव के दर्शन किए जा सकते हैं। चढ़ाई चढ़ने के बाद महाकाली, जोगणीजोत, कालीघाटी का छोटा सा मंदिर आता है। यहां से भी श्रीखंड महादेव के दर्शन किए जा सकते हैं। इसके आगे घाटी में ढांक दुआर, कुणासा घाटी, व काली घाटी देखने योग्य स्थल हैं।  कहते हैं कि भीमडुआरी में अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां पर ठहरे थे इसलिए इसका नाम भीमडुआरी पड़ा। यहां विश्राम करने के बाद यात्री श्रीखंड महादेव के दर्शन के लिए निकल पड़ते हैं। यहां से कैलाश दर्शन की दूरी लगभग 7 कि.मी. है। आगे छोटे-छोटे कल-कल करते नाले व ऊंचे पहाड़ों से गिरती हुई शोर मचाती हुई पानी की धाराएं फूलों से लदी घाटियां व मां पार्वती के बाग यात्रियों को कठिन यात्रा का एहसास नहीं होने देते। चार घंटों का सफर तय करने के बाद नैनसर झील आ जाती है। कहते हैं कि माता पार्वती को जब भस्मासुर ने डराया था तब वे रो पड़ी थीं उनके आंसुओं  की धारा से ही इस आंख के आकार के सरोवर का निर्माण हुआ व इसलिए इसका नाम नैनसर पड़ा। नैनसर से आगे शुरू होती है और भी कठिन और दुर्गम यात्रा। भीमबही में बहुत बड़ी चट्टानें हैं जिन पर कुछ लिखा हुआ है। कहते हैं कि अज्ञातवास के दौरान भीम ये चट्टानें यहां लाए थे। चढ़ाई चढ़ते समय कुछ ऐसी जगह भी आती है जहां पर एक नन्हें बालक की तरह रेंग कर चढ़ना पड़ता है। बर्फ के ग्लेशियर लांघ कर यात्री यहां पहुंचते हैं परंतु श्रीखंड कैलाश से थोड़ा पीछे काफी बड़ा ग्लेशियर लांघना पड़ता है। अब लगभग 60-70 फुट ऊंचे प्राकृतिक शिवलिंग व साथ में थोड़ा हट के भगवान गणपति व मां पार्वती के दर्शन शुरू हो जाते हैं व सामने श्री कार्तिकेय स्वामी के दर्शन किए जा सकते हैं। भारी ठंड व 1800 फीट की ऊंचाई पर श्रीखंड महादेव स्थित होने के कारण यहां पर ज्यादा देर ठहरना संभव नहीं होता। परंतु थोड़ी देर दर्शन करके ऐसा अनुभव होता है कि जैसे स्वर्ग की यात्रा की जा रही हो। यह यात्रा कठिन होने के साथ-साथ अति मनोहारी, सुखदायी व अध्यात्मिक शांति प्रदान करने वाली है।

बुधवार, जुलाई 11, 2012

शहीद सतीश वर्मा

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बडागांव सांगरी के शहीद सतीश वर्मा ने एक छोटी सी आयु में सांगरी और शिमला के युवाओं कोराष्ट्र सेवा का सन्देश दिया !

जन्म :- 21 अप्रेल 1972 को पिता करम चंद और माता आमलू देवी के घर सतीश वर्मा ने जन्म लिया
शिक्षा : -सतीश कुमार ने अपनी पढ़ाई राजकीय प्राथमिक पाठशाला और राजकीय वरिष्ठ माद्यमिक  पाठशाला बडागांव (सांगरी) से की मार्च 1988 में दसवी परीक्षा पास कर द्वितीय  बटालियन डोगरा रेजिमेंट में भारती हुए !
साहसिक कार्य: -साहसिक कामों के परिणाम स्वरुप सतीश वर्मा को अनेक प्रन्संसा पात्र दिए गए ! 1991 से 93 में इन्होने जालंधर के सी ऐआपरेशन के दौरान काकड़ सेक्टर में दुश्मनों का जम कर सामना किया
और कारगिल की ऊँची चोटी ओ पी हिल पर कब्जा करने केदौरान सुरक्षा में महत्वपूरण भूमिका
निभाई ! ओपरेशन के समय वे राजस्थान में तेनात थे !  इसके बाद जून 2001 में इन्हें मश्कोहघाटी कारगिल भेजा गया जहाँ सतीश वर्मा को सिपाही से लांस नायक की पदौनती दी गई ! 11 जुलाई 2001 को द्वितीय बटालियन डोगरा रेजिमेंट के सी आई ओपरेशन के समय गुरेज सेक्टर केब्रोब गाँव में  पेट्रोलिंग लाइन पर चोकसी के दौरान दुश्मनों से मुठभेड़ हुई ! इसमें सतीश वर्मा ने तीन दुश्मनों को ढेर किया ! और स्वयं भी मातृभूमि पकी रक्षा करते हुए शहीद हो गए !
अंतिम विदाई:- 15 जुलाई 2001 को शहीद सतीश कुमार का अंतिम संस्कार राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला बड़ागांव के मैदान मै किया गया गाँव के लोगो,सतीश वर्मा के सहपाठियों,परिवारजनों और 1832 एलटी रेजिमेंट के कमांड ऑफिसर ऐ के मोरे सहित मेजर जे सी ओ तथा सेना के जवानो , रामपुर बुशहर के एस डी ऍम अरविन्द शुक्ला, डी एस पी रामपुर बुशहर सहित अनेक लोगो ने शहीद सतीश वर्मा को श्र्दासुमन अर्पित किये..
यादगार :- राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला बड़ागांव के मैदान मे शहीद सतीश वर्मा की याद मे उनकी प्रतिमा लगाई गयी जोकि युवाओ और अन्य सभी लोगो को देशभक्ति की सीख देती है

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रविवार, जून 10, 2012

श्रीखण्‍ड छड़ी यात्रा 2012

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हिमालय में बसे श्रीखण्‍ड महादेव की पवित्र श्रीखण्‍ड छड़ी यात्रा 30 जून 2012 को जिला कुल्‍लु के निरमण्‍ड से आरम्‍भ हो रही है। छड़ी यात्रा का नेतृत्‍व महंत अशोक गिरी फलाहारी बाबा करेंगे। इसमें दो छडि़या होंगी जिसमें एक माता अंबिका की और दूसरी दतात्रेय महाराज की होगी। श्रीखण्‍ड छड़ी यात्रा एवं ग्राम सुधार समिति के अध्‍यक्ष देवेन्‍द्र पाल शर्मा और सचित कुशल राम शर्मा ने बताया कि 30 जून को छड़ी का विधि विधान से पूजन किया जाऐगा । यात्रा निरमण्‍ड के दशनामी जूना अखाड़े से ब्राहटी नाला तक प्रस्‍थान करेगी 1 जुलाई 2012 को यात्रा ब्राहटी नाला से थाचड़ु से भीमडवार पहुंचेगी । 3 जुलाई को भीम डवारी से श्रीखण्‍ड दर्शन के लिए रवाना होगी। उन्‍होने बताया कि 8 जुलाई को निरमण्‍ड में भंडारे का आयोजन किया जाऐगा। 

मंगलवार, फ़रवरी 14, 2012

कुमारसैन की पल्‍लवी जाऐगी जापान

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राजकीय वरिष्‍ठ माध्‍यमिक पाठशाला कुमारसैन शिमला की छात्रा पल्‍लवी वर्मा का चयन जापान यात्रा के लिए हुआ है। भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय The Japan East Asia Network of Exchange for Students and Youths (JENESYS) के तहत यह चयन हुआ  है । इस योजना के तहत पुरे देश से लगभग पौन तीन सो छात्र छात्राओं का चयन हुआ है। शिमला जिला से इस यात्रा के लिए 14 छात्रों का चयन हुआ है। पाठशाला के प्राचार्य कमलजीत सिंह ठाकुर ने पल्‍लवी को इस चयन के लिए बधाई देते हुए इसे  स्‍कूल और क्षेत्र के लिए गर्व की बात बताया है। जमा एक कक्षा में विज्ञान संकाय की छात्रा पल्‍लवी कुमारसेन के साथ लगते गांव बई से बलबीर सिंह वर्मा  की पुत्री है।  पल्‍लवी ने इस सफलता का श्रेय अपने माता पिता और अध्‍यापकों को दिया है। पल्‍लवी आरम्‍भ से ही होनहार छात्रा रही है। दसवीं की हिमाचल प्रदेश स्‍कूल शिक्षा बोर्ड की परीक्षा में भी पल्‍लवी ने नब्‍बे प्रतिशत से उपर अंक प्राप्‍त किये है। 

बुधवार, फ़रवरी 08, 2012

अश्विनी रमेश को हिमोत्‍कर्ष हिमाचलश्री पुरस्‍कार

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साहित्‍कार और प्रशासनिक अधिकारी अश्विनी रमेश को हिमोत्‍कर्ष साहित्‍य संस्‍कृति एवं जनकल्‍याण परिषद हिमाचल प्रदेश ने हिमोत्‍कर्ष हिमाचलश्री पुरस्‍कार 2011-12 से सम्‍मानित किया है। रमेश साहित्‍य में विशेष रूचि रखते है। अश्विनी रमेश का एक काव्‍य संग्रह ज़मीन से जुड़े आदमी का दर्द  भी प्रकाशित हो चु का है जिसे साहित्‍य जगत में बेहद सराहा गया है।  अश्विनी रमेश का जन्‍म 25 मई 1961 को जिला शिमला के ठियोग में गांव कुन्‍दली में हुआ। अश्विनी रमेश हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय से संस्‍कृत में एम0 फिल0 और अंग्रेजी में एम0ए0 की उपाधि प्राप्‍त है। अश्विनी रमेश की रचनायें विभिन्‍न पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के साथ आकाशवाणी शिमला से प्रसारित भी हो  चुकी है। अश्विनी रमेश हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा के अधिकारी है और ठियोग की साहित्यिक संस्‍था सर्जक से भी जुड़े है। अन्‍तरजाल पर उनके महफिले शायरी  और Poetry--A Blend of Real, Natural and the Mystic   उपलब्‍ध है। अश्विनी रमेश को अनेकानेक बधाई। 


सोमवार, जनवरी 30, 2012

गांधी जी

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गांधी जी श्रीमद्भागवत गीता को अपना मार्गदर्शक धर्मग्रंथ मानते थे। एक बार किसी ने उनसे पूछा, 'गीता की किस बात ने आपको सबसे ज्यादा प्रभावित किया है?' गांधी जी ने जवाब दिया, ' वैसे तो गीता के कई उपदेश उल्लेखनीय हैं, पर निष्काम कर्म करते रहने और सत्य-न्याय पर अटल रहने के उपदेश को वह सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं। इसके साथ ही आवश्यकता से अधिक संपत्ति संचय करना भी अधर्म है।'  एक बार गांधी जी का एक परिचित धनाढ्य उनसे मिलने पहुंचा। उसने कहा, 'जमाना बेईमानों का है। आप तो जानते ही हैं कि मैंने अमुक नगर में लाखों रुपये खर्च कर धर्मशाला का निर्माण कराया था। अब गुटबाजों ने मुझे ही प्रबंध समिति से हटा दिया है। क्या न्यायालय में मामला दर्ज कराना उचित होगा?' गांधी जी ने कहा, 'तुमने धर्मशाला धर्मार्थ बनवाई थी या उसे व्यक्तिगत संपत्ति बनाए रखने के लोभ में?   असली धर्म तो वह होता है, जो बिना लाभ की इच्छा के किया जाता है। तुम अभी तक नाम व प्रसिद्धि का लालच नहीं त्याग पाए हो। इसलिए तुम पद से हटाए जाने से दुखी हो।' यह सुनकर उस व्यक्ति ने संकल्प लिया कि वह आगे किसी भी पद अथवा नाम के विवाद में नहीं पड़ेगा।  गांधी जी लोगों से स्वाधीनता आंदोलन व हरिजन कल्याण के कार्यों के लिए चंदा लिया करते थे। वह उसका एक पैसा भी अपने ऊपर खर्च नहीं करते थे। उनका मानना था कि दूसरों के खून-पसीने के पैसे का अपने स्वार्थ के लिए दुरुपयोग करना अधर्म है।

साभार अमर उजाला 

गुरुवार, जनवरी 26, 2012

विजय शर्मा को पदमश्री

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हिमाचल को पेंटिंग्स में पदमश्री अवार्ड से नवाजा गया है और यह पुरस्कार चंबा के विख्यात चित्रकार 50 वर्षीय भाषा अधिकारी विजय शर्मा को मिला है। श्री शर्मा जो कि भूरि सिंह संग्रहालय में कार्यरत हैं। इससे पहले विजय शर्मा को वर्ष 1990 में तत्कालीन राष्ट्रपति श्री बेंकट रमन ने राष्ट्रपति अवार्ड से सम्मानित किया था। विजय शर्मा अब तक 15 हजार से भी ज्यादा ऑयल पेंटिग्स बना चुके हैं। 35 वर्षों से वह इस हुनर को पाले हुए हैं। उन्हें यह हुनर शौकिया ही मिला है, उन्हें चंबा संग्रहालय से ही पुराने कलाकारों की पेटिंग्स को देखकर प्रेरणा मिली है। उनकी पेंटिग कांगड़ा, बसौली पर आधारित है। राधा-कृष्ण रागमाला उनकी अन्य कृतियां हैं। विजय शर्मा इस पुरस्कार को पाकर खुश हैं। अपने साथ उन सभी कलाकारों को इस खुशी में शामिल करना चाहते हैं, जो प्रदेश में गुमनाम जिंदगी जी रहे हैं। उनमें हुनर तो है मगर उनकी अब तक भी पहचान नहीं हो पाई है। विजय शर्मा जिला के ऐसे दूसरे व्यक्ति हैं, जिन्हें पदमश्री से नवाजा गया है। इससे पहले बिजली बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय कैलाश महाजन भी इस अवार्ड को हासिल कर चुके हैं।

गणतंत्र दिवस की शुभकानायें

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गणतंत्र दिवस  26 जनवरी को मनाया जाता है, 26 जनवरी1950 को भारत का संविधान लागू हुआ| बस तभी से देश गणतंत्र हुआ और उसी उपलक्ष मे गणतंत्र दिवस हर वर्ष मनाया जाता है| जनवरी 26, 1950 भारतीय इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। भारत का संविधान, इसी दिन अस्तित्व मे आया। इस दिन भारत एक सम्पूर्ण गणतान्त्रिक देश बन गया. 26 जनवरी की एैतिहासिक महत्‍व भी है। सन 1929 के दिसंबर में लाहौर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में  प्रस्ताव पारित कर  घोषणा की गई कि यदि अंग्रेज सरकार 26 जनवरी, 1930 तक भारत को उपनिवेश का पद नहीं प्रदान करेगी तो भारत अपने को पूर्ण स्वतंत्र घोषित कर देगा। 26 जनवरी, 1930 तक जब अंग्रेज सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने उस दिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के निश्चय की घोषणा की और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ किया। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। तदनंतर स्वतंत्रता प्राप्ति के वास्तविक दिन 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। 26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए  गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई

बुधवार, जनवरी 25, 2012

हिमाचल प्रदेश का पूर्ण राज्‍यत्‍व दिवस

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आज ही के दिन 1971 में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्‍य का दर्जा प्राप्‍त हुआ था। हिमाचल प्रदेश का गठन 15 अप्रेल 1948 को हुआ था। 1 नवम्‍बर 1966 को कुछ और क्षैत्र प्रदेश में शामिल किए गए थे।
सभी मित्रों को इस दिवस की अनेकानेक शुभकामनायें।

गुरुवार, जनवरी 12, 2012

मकर संक्रांति

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माघ माह का मकर संक्रांति पर्व 14 जनवरी शनिवार  को मनाया जाएगा। मकर संक्रांति  पर दान का विशेष महत्व है। दान में तिल और गुड़ देना विशेष फल देने वाला माना जाता है। परंपरागत रूप से लोहड़ी पर लोग हवन का आयोजन करते है, जिसमें तिल, घी, मूंगफली की आहुति डाली जाती है।  शिमला के  उपरी क्षेत्रों में संक्रांति पर तिल के लड्डू बनाने की परम्‍परा  है।  लोहड़ी के अगले दिन  मकर संक्रांति पर्व पर दान पुण्य को विशेष महत्‍व  दिया जाता  है। तिल और खिचड़ी के दान को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। घरों में संक्रांति के दिन तिल के व्यंजन और खिचड़ी बनाई जाती है। मकर संक्रांति पर लोग सूर्य पूजन कर पवित्र नदियों में स्नान कर पुण्य प्राप्त करते हैं। कहा जाता है कि माघ माह की पूर्णिमा में जो व्यक्ति ब्राह्मण को दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।  शिमला के समीप तत्तापानी जो लगभग 51 किलोमीटर है, में भी इस दिन दान पुण्य किया जाता है। यहां तुला दान का विशेष महत्व है। माघ माह के दौरान मनुष्य को कम से कम एक बार पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। माघ माह में सूर्य के मकर राशि में स्थित होने पर अवश्य तीर्थ स्नान करना चाहिए। माघ माह में पवित्र नदियों में स्नान करने से विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है। वहीं शास्त्रों और पुराणों में वर्णित है कि इस माह में पूजन तथा  स्नान करने से भगवान नारायण को प्राप्त किया जा सकता है। शिमला से तत्तापानी  धामी, बसंतपुर मार्ग से पंहुचा जा सकता है । बर्फ बारी के चलते मशोबरा सड़क पर वाहनों की आवाजाही प्रभावित होने की स्थिति में इस मार्ग का प्रयोग किया जा सकता है। आम  तौर पर मशोबरा बलदेंया से तत्तापानी पहुंचा जा सकता है। 

सोमवार, जनवरी 09, 2012

'तीसरी आँख' की पुरस्कार/सम्मान-श्रृंखला:

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जितेन्द्र 'जौहर' की त्रैमा. 'अभिनव प्रयास' (अलीगढ़, उप्र) के- बहुचर्चित साहित्यिक स्तम्भ 'तीसरी आँख' की पुरस्कार/सम्मान-श्रृंखला: के बारे में मेल मिली है साहित्यिक मित्रों के लिए विवरण दे रहा हूं 

त्रैमा. 'अभिनव प्रयास' (अलीगढ़, उप्र) के- बहुचर्चित साहित्यिक स्तम्भ 'तीसरी आँख' की पुरस्कार/सम्मान-श्रृंखला:

रविवार, दिसंबर 11, 2011

हिमाचल के लेखकों के लेखन की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान

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 ठियोग के डिग्री कॉलेज में साहित्यिक संस्था 'सर्जक की ओर शनिवार को  रखी गई संगोष्ठी में हिमाचल के लेखकों के लेखन की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और उसके सरोकारों को लेकर विचार विमर्श हुआ। इसमें प्रदेश से बाहर से आए वरिष्ठ लेखक और आलोचक सत्यपाल सहगल ने कई टिप्स लेखकों को दिए। उन्होंने कहा कि हिमाचल में लिखा जा रहा साहित्य किसी तरह भी कमतर नहीं है। उन्होंने कविताओं में अध्यात्म की भी वकालत की। ठियोग में इतने सारे लेखकों के जुटने पर उनका कहना था कि ठियोग प्रदेश की साहित्यिक राजधानी बनता जा रहा है। पहले यह स्थान मंडी को हासिल था। हाल ही में बिहार की 'जनपथ और मध्यप्रदेश की 'आकंठा पत्रिकाओं की और से निकाले गए हिमाचल विशेषांकों के लिए संपादकों अनंत कुमार सिंह और हरिशंकर अग्रवाल का आभार जताया और हिमाचल के वर्तमान लेखन को समग्रता के साथ देश भर के पाठकों के सामने लाने के लिए उन्हें साधुवाद दिया। सर्जक के इस कार्यक्रम का दूसरा सत्र और भी सफल रहा जब हाल में प्रदेश के लगभग सभी वर्तमान हिन्दी कवियों ने अपनी बेहतरीन कविताएं सुनाईं। एक और जहां प्रदेश के स्थापित कवियों अवतार एनगिल, तेजराम शर्मा, रेखा, मधुकर भारती ने अपनी ताजा कविताएं सुनाईं, वहीं आजकल के चर्चित युवा कवियों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। ऊना के कुलदीप शर्मा ने अपनी कविता 'सिक्योरिटी गार्ड के जरिए वर्तमान युवा पीढ़ी के असंतोष की ऐसी तस्वीर खींची कि हाल देर तक तालियों से गूंजता रहा। ऊना के ही युवा शायर शाहिद अंजुम ने अपनी गजलों के शेरों में परिवारों के टूटने, रिश्तों के बिखरने और महीन संवेदनाओं की परतें खोलते कई बिंब खींचे। उनकी एक बानगी देखिए-- अब तो मां बाप भी मुल्कों की तरह मिलते हैं-सरहदों की तरह औलाद भी बंट जाती है। केलंग से आए अजेय ने भी अर्थों की गहराई लिए कविता सुनाई। सुरेश सेन निशांत-सुंदरनगर, यादवेंद्र शर्मा, आत्माराम रंजन, ओम भारद्वाज, प्रकाश बादल, सुदर्शन वशिष्ठ, बद्री सिंह भाटिया, सत्यनारायण स्नेही, मोनिका, रत्न चन्द निर्झर, अरुण डोगरा, हरिदत्त वर्मा, देवेन्द्र शर्मा, वेद प्रकाश, सुनील ग्रोवर, मोहन आदि दो दर्जन कवियों ने कविता पाठ किया। पहले सत्र की अध्यक्षता डॉ. सत्यपाल सहगल और दूसरे सत्र की अध्यक्षता अवतार एन. गिल ने की। मंच संचालन सुदर्शन वशिष्ठ और आत्माराम रंजन ने किया।

मंगलवार, दिसंबर 06, 2011

फेसबुक पर शब्‍द चयन

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आज सभी समाचार चैनलों पर फेस बुक पर  की जाने वाली टिप्‍पणियों का समाचार चर्चा होती रही वैसे यह मामला कपिल सिब्‍बल द्वारा उठाया गया। वैसे सिब्‍बल जी ठीक है 1 पिछले दिनों इन्‍ही टिप्‍पणियों के कारण फेसबुक को अलविदा कहने का मन हो रहा था। मित्रों ने फिलहाल इसे टालने का आग्रह किया। फेसबुक पर अधिकतर लोगों में शब्‍द चयन की शालीनता नहीं है। फेसबुक पर अध्‍यापक संघों के पृष्‍ठ बने है । शिक्षा से जुड़ा होने के कारण इन पृष्‍ठों पर जाता रहता हूं परन्‍तु दुख होता है कि शिक्षा से जुड़े लोगो के शब्‍द चयन भी ठीक नहीं है1 एक ने टिप्‍पणी में शुशु और पोटी शब्‍दों का उल्‍लेख करते हुए टिप्‍पणी की तो उस व्‍यक्ति की सोच पर हैरानी होने लगी कि कैसे कैसे लोग है जो सम्‍भवत: शालीनता शब्‍द के महत्‍व को नहीं जानते । वैसे फेसबुक की जाने वाली टिप्‍पणियों पर नज़र रखी जानी चाहिए। फेसबुक सम्‍पर्क और सृजनात्‍मकता  का साधन हो सकता है। वैसे कुछ सन्‍दर्भों को को छोड़ कर मेरा अनुभव अच्‍छा रहा है अच्‍छे और साहित्यिक मित्रों से सम्‍पर्क हो पाया है। खोए हुए मित्रों से पुन: संवाद स्‍थापित हो पाया है। सभी उपयोगिता  को ध्‍यान में रखते हुए टिप्‍पणी करनी चाहिए। ग़लत को ग़लत कहना ही चाहिए समाज में ग़लत मान्‍यताओं का विरोध होना ही चाहिए। लेकिन इस विरोध में शब्‍दों की शालीनता पर भी अवश्‍य ध्‍यान दिया जाना चाहिए । 

रविवार, दिसंबर 04, 2011

देव आनंद नहीं रहे ।

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धर्मदेव आनंद, यानी  देव आनंद नहीं रहे । लंदन में उनका निधन हो गया। देव साहब भारतीय सिनेमा के बहुत ही सफल कलाकार, निर्देशक और फिल्म निर्माता थे । भारत सरकार ने देव आनंद को भारतीय सिनेमा के योगदान के लिए 2001 में पद्मा भूषण और 2002 में दादा साहब फाल्के पुरस्कारों से सम्मानित किया। देव आनन्‍द साहब को सादर नमन 1

शनिवार, नवंबर 19, 2011

विदा फेसबुक

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फेसबुक से मोह हट सा गया है। इसिलिए आज मात्र अलविदा फेसबुक लिख कर अपना खाता निरस्‍त करने की सोच रहा हूं। कुछ मित्रों की मेल और फोन भी आए है। कारण वर्तमान परिपेक्ष्‍य में फेसबुक को अपने अनुकूल नहीं पा रहा हूं । लेकिन इससे बढ़ कर भी एक कारण है कि मेरा खाता और मेल अन्‍यत्र खोला गया है। अनहोनी की आशंका से ऐसा कर रहा हूं। आशा है मित्र इसे अन्‍यथा नहीं लेंगे।

रानी लक्ष्मीबाई

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 रानी लक्ष्मीबाई ( 19 नवंबर 1828  17 जून 1858) मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना थीं। इनका जन्म वाराणसी जिले के भदैनी नामक नगर में हुआ था। इनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था पर प्यार से मनु कहा जाता था। इनकी माता का नाम भागीरथी बाई तथा पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी ब्राह्मण थे और मराठा पेशवा बाजीराव की सेवा में थे। माता भागीरथीबाई एक सुसंस्कृतबुद्धिमान एवं धार्मिक महिला थीं। मनु जब चार वर्ष की थीं तब उनकी माँ की म्रत्यु हो गयी। चूँकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए पिता मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गए जहाँ चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया। लोग उसे प्यार से "छबीली" बुलाने लगे। मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्रों की शिक्षा भी ली।  सन 1842 लक्ष्मीबाई रखा गया। सन 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया पर चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी। सन 1853 में राजा गंगाधर राव का बहुत अधिक स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की मृत्यु 21नवंबर 1853 में हो गयी। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया। डलहौजी की राज्य हड़पने की नीति के अन्तर्गत ब्रितानी राज्य ने दामोदर राव जो उस समय बालक ही थेको झाँसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दियातथा झाँसी राज्य को ब्रितानी राज्य में मिलाने का निश्चय कर लिया। तब रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रितानी वकील जान लैंग की सलाह ली और लंदन की अदालत में मुकदमा दायर किया। यद्यपि मुकदमे में बहुत बहस हुई परन्तु इसे खारिज कर दिया गया। ब्रितानी अधिकारियों ने राज्य का खजाना ज़ब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज़ को रानी के सालाना खर्च में से काट लिया गया। इसके साथ ही रानी को झाँसी के किले को छोड़ कर झाँसी के रानीमहल में जाना पड़ा। पर रानी लक्ष्मीबाई ने हर कीमत पर झाँसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय कर लिया था। झाँसी 1857के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया। 1857 के सितंबर तथा अक्तूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथादतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झाँसी की ओर बढना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लडाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर कब्जा कर लिया। परन्तु रानीदामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बच कर भागने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर कालपी पहुंची और तात्या टोपे से मिली। तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया. 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय में ब्रिटिश सेना से लढ़ते-लढ़ते रानी लक्ष्मीबाई की मौत हो गई.
 
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