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शनिवार, नवंबर 19, 2011

इंदिरा गांधी

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इंदिरा प्रियदर्शिनी गाँधी :  (19 नवंबर 1917 -31 अक्टूबर 1984) वर्ष 1966 से 1977 तक लगातार 3 पारी के लिए भारत गणराज्य की प्रधानमन्त्री रहीं और उसके बाद चौथी पारी में 1980 से लेकर 1984 में उनकी राजनैतिक हत्यातक भारत की प्रधानमंत्री रहीं। वे भारत की प्रथम और अब तक एकमात्र महिला प्रधानमंत्री रहीं।

इन्दिरा का जन्म 19 नवंबर 1917 को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली नेहरू परिवार में हुआ था। इनके पिता जवाहरलाल नेहरू और इनकी माता कमला नेहरू थीं। इन्दिरा को उनका गांधी उपनाम फिरोज़ गाँधी से विवाह के पश्चात मिला था। इनका मोहनदास करमचंद गाँधी से न तो खून का और न ही शादी के द्वारा कोई रिश्ता था। इनके पितामह मोतीलाल नेहरू एक प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादी नेता थे। इनके पिता जवाहरलाल नेहरूभारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक प्रमुख व्यक्तित्व थे और आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री रहे।
1934–35 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के पश्चात, इन्दिरा ने शान्तिनिकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा निर्मित विश्व-भारती विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ही इन्हे "प्रियदर्शिनी" नाम दिया था। इसके पश्चात यह इंग्लैंड चली गईं और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठीं, परन्तु यह उसमे विफल रहीं, और ब्रिस्टल के बैडमिंटन स्कूल में कुछ महीने बिताने के पश्चात, 1937 में परीक्षा में सफल होने के बाद इन्होने सोमरविल कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में दाखिला लिया। इस समय के दौरान इनकी अक्सर फिरोज़ गाँधी से मुलाकात होती थी, जिन्हे यह इलाहाबाद से जानती थीं, और जो लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में अध्ययन कर रहे थे। अंततः 16 मार्च 1942 को आनंद भवन, इलाहाबाद में एक निजी आदि धर्मब्रह्म-वैदिक समारोह में इनका विवाह फिरोज़ से हुआ।
ऑक्सफोर्ड से वर्ष 1941 में भारत वापस आने के बाद वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल हो गयीं।
1950 के दशक में वे अपने पिता के भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल के दौरान गैरसरकारी तौर पर एक निजी सहायक के रूप में उनके सेवा में रहीं। अपने पिता की मृत्यु के बाद सन् 1964 में उनकी नियुक्ति एक राज्यसभा सदस्य के रूप में हुई। इसके बाद वे लालबहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सूचना और प्रसारण मत्री बनीं।

श्री लालबहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद तत्कालीन कॉंग्रेस पार्टी अध्यक्ष के. कामराज इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने में निर्णायक रहे। गाँधी ने शीघ्र ही चुनाव जीतने के साथ-साथ जनप्रियता के माध्यम से विरोधियों के ऊपर हावी होने की योग्यता दर्शायी। वह अधिक बामवर्गी आर्थिक नीतियाँ लायीं और कृषि उत्पादकता को बढ़ावा दिया। 1971 के भारत-पाक युद्ध में एक निर्णायक जीत के बाद की अवधि में अस्थिरता की स्थिती में उन्होंने सन् 1975 में आपातकाल लागू किया। उन्होंने एवं कॉंग्रेस पार्टी ने 1977 के आम चुनाव में पहली बार हार का सामना किया। सन् 1980 में सत्ता में लौटने के बाद वह अधिकतर पंजाब के अलगाववादियों के साथ बढ़ते हुए द्वंद्व में उलझी रहीं जिसमे आगे चलकर सन् 1984 में अपने ही अंगरक्षकों द्वारा उनकी राजनैतिक हत्या हुई।

रविवार, अक्टूबर 30, 2011

बेगम अख्‍तर और वी शांता राम की पूण्‍य तिथि

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आज बेगम अख्‍तर और वी शांता राम की पूण्‍य तिथि है। 

सोमवार, अक्टूबर 24, 2011

HAPPY DIWALI

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HAPPY DIWALI TO ALL BLOGGERS AND AS WELL AS MY DEARER AND NEARER

सोमवार, अक्टूबर 10, 2011

जगजीत सिंह लोकप्रिय गज़ल गायक

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जगजीत सिंह  लोकप्रिय गज़ल गायक । संगीत मधुर और आवाज़ संगीत के साथ खूबसूरती से विलय होती ।  ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को पहले पहल दिया जाना हो तो जगजीत सिंह का ही नाम ज़ुबां पर आता है। उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया।  जगजीत जी का जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए जालंधर आ गए। डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया. बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला। गंगानगर मे ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की। आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं। गजल के बादशाह जगजीत सिंह का 10 अक्‍तूबर 2011 को मुंबई में देहांत हो गया! जगजीत सिंह को श्रध्दांजली !

गुरुवार, अक्टूबर 06, 2011

दशहरा

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दशहरा सभी स्‍थानों पर परम्‍परागत और हर्षोल्‍लास के साथ मनाया जाता है । स्‍थान छोटा हो या बड़ा आस्‍था के दर्शन सभी जगहों पर होते है । मेरे कस्‍बे में लगभग 15 वर्षों के बाद रामलीला का मंचन किया गया। सभी ने हर्षोल्‍लास के साथ मंचन में साथ दिया। आज दशहरा पर लोगों में हर्ष व्‍याप्‍त था। कुछ तस्‍वीरें दशहरा आयोजन की 


















शुक्रवार, सितंबर 30, 2011

वर्गभेद

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आप जहां रहते है वहां के लोगों से अपनत्‍व होना स्‍वाभाविक है आप चाहे किसी भी क्षेत्र से क्‍यों न हो। इसी अपनत्‍व में लोग आपसे बहुत कुछ चाहने लगते है। यदि आप नहीं दे पाए तो लोगों का मन कितना काला है ये सामने आ ही जाता है। क्‍या कोई ऐसा नहीं है जो ईमानदारी सरलता का सही मूल्‍यांकन कर सके या सभी वर्गभेद में डूबे हुए है । योग्‍यता का कोई सम्‍मान नहीं रहा है शायद। अन्‍तकरण भीतर तक छलनी हो जाता है यह भेद देख कर । क्‍या सभी कसाई है कि मौका मिला तो मुर्गा मरोड़ ही देगे। हम पीछे की ओर चल रहे या अग्रसर है क्‍या मालुम। फूल बोने पर क्‍या कांटे ही मिलते रहेगे। अब तो हद हो गई है यारब ..............


शनिवार, सितंबर 24, 2011

लाटरीयां कैसी कैसी

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अकसर लोग कहा करते है कि अन्‍तरजाल पर आपको अच्‍छी और बुरी हर प्रकार की सामग्री मिल जाती है। यह व्‍यक्ति विशेष पर है कि वह किसका उपयोग कैसे करता है। अन्‍तरजाल पर ठग भी भरे पड़े है । जब भी अपना मेल बाक्‍स खोलता हूं तो विशेष छूट और लाटरी की मेल देखने को मिलती थी । आरम्‍भ में ये सभी मेल पत्र स्‍वरूप में होती थी। लेकिन अब ठगों ने प्रमाण पत्र भेजने शुरू कर दिये है । लेकिन मेल के मसौदे में अन्‍तर कुछ भी नहीं होता। मेल में रूपये भेजने की बात पहले भी होती थी अब भी होती है। फर्क मात्र इतना है कि लाटरी की सूचना प्रमाण पत्रों के साथ सूचित की जाती है साथ ही एक तस्‍वीर लगा राजनायिक परिचय पत्र । अगर आप मेल में बताई गई वेब साईट पर जाते है तो वह होती ही नहीं है। अब इन ठगों ने भारतीय कम्‍पनीयों के नामों का सहारा लेना भी आरम्‍भ कर दिया है। या हो सकता है कि वे भारतीय ठग हो। खैर मेल तो आती रहेगी। भारी भरकम राशि का लालच भी होगा और साथ ही प्रमाण पत्र भी। चलो इस बहाने  इन प्रमाण पत्रों को देख कर खुश हो जाया करेंगे। अपने मित्रों के लिए इन सभी के वेब शाटस दे रहा हूं । रूपया तो मिलने से रहा। आप बधाई तो देगे ही। 

शुक्रवार, जुलाई 22, 2011

श्री खण्‍ड यात्रा की तस्‍वीरें

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मेरे मित्र रमेश चौहान गत दिन श्रीखण्‍ड यात्रा पर गए और लौट कर उन्‍होने तस्‍वीरें दी मित्रों के लिए तस्‍वीरें यहां प्रस्‍तुत है
















बुधवार, जुलाई 20, 2011

एनाकॉन्डा

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एनाकॉन्डा कहते ही आंखों के सामने एक विशालकाय सांप की तस्वीर उभर आती है। यह सच है कि एनाकॉन्डा विश्व के सबसे बड़े और खतरनाक सांपों में से एक हैं। कैसे? ठीक बात है भाई, यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए। तो चलिए, चलते हैं दक्षिण अमेरिका के जंगलों में और ढूंढते हैं एनाकॉन्डा को..
लीजिए, पहुंच गए अमेज़ॉन के ज़ंगलों में। अब ढूंढिए एनाकॉन्डा। लेकिन यह इतना आसान नहीं। यह सांप बड़े होते हैं, बहुत ही ज्यादा बड़े लेकिन छुपे रहते हैं। इनसे दोस्ताना व्यवहार की उम्मीद तो नहीं कर रहे थे न आप। जी, ऐसा बिलकुल मत कीजिएगा। मैत्री भाव नहीं रखते यह सांप। एनाकॉन्डा खुद को छुपाने में माहिर होते हैं और पानी या दलीदली इलाके में अपनी खाल के अनुरूप पृष्ठभूमि ढूंढकर छुप जाते हैं। नदियां, झील आदि के पास ही मिलते हैं यह। और जैसे ही खतरा दिखता है, तुरंत पानी में गए और छूमंतर।
वैसे यह सब कहने की बात होगी क्योंकि एक तो क्या खतरा आएगा एक 20 फुट लम्बे और तकरीबन 150 किलो वज़नी सांप पर। और चलो, भूले-भटके आ भी गया कोई हम जैसा इंसानी खतरा, तो यूं तो 20 फुटे जनाब सर्रर्र से सरक नहीं जाएंगे। दिख गए, तो हमें डरने का पूरा मौका देंगे। क्यों, ठीक है न? इतना बड़ा सांप, जो अब तक तो दिख नहीं रहा था, पर अचानक दिखे और वह भी इस तरह सरकता हुआ, तो डर तो लगेगा ही भई।
चलिए, जब तक बाकायदा नहीं दिखते, तब तक थोड़ा परिचय ले लेते हैं श्रीमान एनाकॉन्डा का। ये सांप होते हैं बोआ परिवार के। इसी परिवार में अजगर भी आते हैं। अब समझे, सारे विशालकाय एक ही परिवार में आ जमे हैं।
इनका नाम एनाकॉन्डा क्यों है, क्या मायने होते हैं इसके, यह पूरी तरह से समझ में नहीं आया है। अरे हमें नहीं भाई, वैज्ञानिकों को। इसका मूल एशिया में मिलता दिखाई देता है। कुछ शोध करने वालों ने कहा कि एनाकॉन्डा सिंहली भाषा के किसी शब्द से बना है। तो कुछ का कहना है कि यह तमिल भाषा के शब्द अनाएकोंदरण से बना है, जिसका मतलब होता है हाथी को भी मार गिराने वाला। हूं..यह कुछ ठीक भी लगता है, है न।
वैसे आपको पता है न कि सिंहली भाषा श्रीलंका की आधिकारिक भाषा है। तभी तो कहा कि एनाकॉन्डा नाम का मूल एशिया में मिलता दिखता है।इतना तो ढूंढ लिया, अब तक दिखा नहीं न आपको एनाकॉन्डा? अब क्या अर्जेटीना तक चलें? येलो एनाकॉन्डा कभी-कभी इतने दक्षिण तक भी चले जाते हैं। इनकी बात तो यूं भी अलग है। ये दुनिया के सबसे बड़े सांप होने का गौरव रखते हैं। इनकी लम्बाई होती है 30 फुट और वज़न 227 किलो। बाबा रे!!
लगता है अमेज़ॉन से निराश होकर लौटना पड़ेगा। वैसे दुखी मत होइए, यह सांप वैज्ञानिकों को शोध करने के लिए नहीं मिलता, तो आपको देखने के लिए इतनी आसानी से कैसे मिलेगा। चलते-चलते यह जान लेते हैं कि यह एनाकॉन्डा फिल्म की वजह से मशहूर हुए हैं, या कोई सचमुच खास बात है इनमें।
खास बात यह है कि जैसा कि बताया था एनाकॉन्डा ज़हरीले नहीं होते। पर होते खतरनाक हैं। अपने शिकार को यह शरीर की कुंडली बनाकर उसमें फंसा लेते हैं। फिर कुंडली का शिकंजा तब तक कसते जाते हैं, जब तक कि शिकार दम न तोड़ दे।
ओह, कितना डरवना है यह सब।मादा एनाकॉन्डा अंडे नहीं, संपोलों को जन्म देती है। एक बार में 25-30 छुटके एनाकॉन्डा जन्म लेते हैं। और जन्म के बाद उन्हें किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं होते। ये बेबी, बाबा एनाकॉन्डा भोजन ढूंढने और छुपने आदि के गुर पहले से ही जानते हैं।वैसे कहते हैं बोआ परिवार के सदस्यों के रंग बड़े सुंदर होते हैं।चलिए, इस रंगों वाली बात के साथ वापस चलते हैं। विदा अमेजॉन।

रविवार, जुलाई 17, 2011

सुक्ति - हिंदी

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उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा। - शारदाचरण मित्र

कब वापसी होगी

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आज एकाएक सोचने लगा ब्‍लागवाणी और चिठाजगत की क्‍या वापसी होगी भी या नहीं ।

शुक्रवार, जुलाई 08, 2011

मां भगयाणी मन्दिर हरिपुर धार

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ज़िला सिरमौर के हरिपुरधार में स्थित मां भगयाणी मन्दिर समुद्रतल से आठ हज़ार की ऊंचाई पर बनाया गया है! यह मन्दिर उतरी भारत का प्रसिद्ध मन्दिर है! यह मन्दिर कई दशकों से श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र बना हुअ है! वैसे तो यहां वर्ष भर भक्तों का आगमन रहता है परन्तु नवरात्रों और संक्राति में भक्तों की ज्यादा श्रद्धा रहती है! इसका पौराणिक इतिहास श्रीगुल महादेव से की दिल्ली यात्रा से जुडा है जहां तत्कालीन शासक ने उन्हे उनकी दिव्यशक्तियों के कारण चमडे की बेडियों में बांध बन्दी बना लिया था और दर्वार में कार्यरत माता भगयाणी ने श्रीगुल को आज़ाद करने में सहायता की थी! इस कारण श्रीगुल ने माता भगयाणी को अपनी धरम बहन बनाया और हरिपुरधार मेंस्थान प्रदान कर सर्वशक्तिमान का वरदान दिया! आपार प्राकृतिक सुन्दरता के मध्य बना यह मन्दिर आस्था का प्रमुख स्थल है!  बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिये मन्दिर समिति ने ठहरने का प्रबन्ध किया हुआ है! हरिपुरधार  शिमला से वाया सोलन राजगढ एक सौ पचास किलोमीटर दूर है! जबकि चण्डीगढ से १७५ किलोमीटर है! हरिपुरधार के लिये देहरादून से भी यात्रा की जा सकती है!

शनिवार, जून 11, 2011

आज के दिन 11 जून

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1778 रूसी खोजकर्ता गेरासिम इज्माइलोव अलास्का पहुंचा। 1866 देश में इलाहाबाद उच्च न्यायालय, तत्कालीन आगरा उच्च न्यायालय की स्थापना। 1901 न्यूजीलैंड ने कुक द्वीप पर कब्जा किया। 1978 पाकिस्तान के कराची विश्वविद्यालय में अल्ताफ हुसैन ने छात्न राजनीतिक संगठन ऑल पाकिस्तान मुहाजिर स्टूडेंट आर्गेनाइजेशन की स्थापना की। 1981 ईरान के गोलबाफ में आए 6.9 की तीव्रता के भूकंप में लगभग दो हजार लोग मारे गए। 1991 माइक्रो सॉफ्ट ने MS DOS 5.0 जारी किया    

बुधवार, जून 08, 2011

श्रीखण्ड यात्रा 2011

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Shrikhand Mahadev
श्रीखण्ड सेवा दल और स्थानीय प्रशासन ने वर्ष 2011 में श्रीखण्ड यात्रा की तिथि की घोषणा कर दी है। सभी शिव भक्तजनों को यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता होगी कि हर साल की भांति इस वर्ष भी 16वीं बार श्रीखण्ड महादेव कैलाश यात्रा 15 जुलाई 2011 (श्रावण संक्रांति) से शुरू होने जा रही है और श्रीखण्ड सेवादल के तत्वावधान में यह यात्रा 23 जुलाई 2011 तक चलेगी। इस अवधि में 15 से 22 जुलाई तक श्रीखण्ड सेवादल द्वारा सिंहगाड से प्रतिदिन प्रातः 5 बजे यात्रा के लिए विधिवत जत्था रवाना किया जाएगा। 
यह स्थान समुद्रतल से लगभग 18000 फुट(5155 मीटर) की ऊंचाई पर है जिस कारण यहां मौसम ठण्डा रहता है। अतः यात्रियों से अनुरोध है कि अपने साथ, गर्म कपड़े, कम्बल, छाता, बरसाती व टार्च साथ लाएं। इस यात्रा की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ व प्लास्टिक के लिफाफे साथ न लाएं। यात्रियों से निवेदन है कि पूर्ण रूप से स्वस्थ होने पर ही इस यात्रा में भाग लें। श्रीखण्ड सेवादल कोई सरकारी सहायता प्राप्त संस्था नहीं है, सारा आयोजन सदस्यों के सहयोग से किया जाता है।

आप रामपुर बुशहर (शिमला से 130 किलोमीटर) से 35 किलोमीटर की दूरी पर बागीपुल या अरसू सड़क मार्ग से पहुँच सकते हैं। बागीपुल से 7 किलोमीटर जाँव तक गाड़ी से पहुँचा जा सकता है। जाँव से आगे की यात्रा पैदल होती है। यात्रा के तीन पड़ाव सिंहगाड़ , थाचडू और भीम डवार है। जाँव से सिंहगाड़ तीन किलोमीटर, सिंहगाड़ से थाचडू आठ किलोमीटर की दूरी और थाचडू से भीम डवार नौ किलोमीटर की दूरी पर है। यात्रा के तीनों पड़ाव में श्रीखण्ड सेवादल की ओर से यात्रियों की सेवा में लंगर (निशुल्क भोजन व्यवस्था ) दिन रात चलाया जाता है। भीम डवार से श्रीखण्ड कैलाश दर्शन सात किलोमीटर की दूरी पर है तथा दर्शन उपरांत भीम डवार या थाचडू वापिस आना अनिवार्य होता है।
Shrikhand Mahadev
श्रीखंड महादेव यात्रा के दौरान भक्त जन निरमंड क्षेत्र के कई दर्शनीय स्थलों का भ्रमण भी कर सकते हैं। इस क्षेत्र के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल हैं-

प्राकृतिक शिव गुफा देव ढांक, प्राचीन एवं पौराणिक परशुराम मन्दिर, दक्षिणेश्वर महादेव व अम्बिका माता मन्दिर निरमंड, संकटमोचन हनुमान मन्दिर अरसू, गौरा मन्दिर जाँव, सिंह गाड, ब्राह्टी नाला, थाच्डू, जोगनी जोत, काली घाटी, ढांक डवार, कुनशा, भीम डवार, बकासुर वध, दुर्लभ फूलों की घाटी पार्वती बाग़, माँ पार्वती की तपस्थली नैन सरोवर, महाभारत कालीन विशाल शिलालेख भीम बही।

रविवार, मई 29, 2011

तानु जुब्‍बड़ मेला 30 मई

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                                                                                                       शिमला जिला में नारकंडा ब्लाक के तहत ग्राम पंचायत जरोल में स्थित तानु जुब्बढ़ झील एक सुंदर पर्यटक स्थल है। यहाँ नाग देवता का प्राचीन मन्दिर हैं ! यह झील नारकंडा से 9 किलो मीटर दूर समुद्रतल से 2349 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है ! इस झील का एक पुरातन इतिहास रहा है ! इतनी ऊंचाई पर समतल मैदान के बीचो बीच आधा किलोमीटर के दायरे लबालब पानी से भरी इस झीलं को देख कर हर कोई सोच में पड़ जाता है ! जुब्बढ़ का स्थानीय भाषा में अभिप्राय है घास का मैदान ! इस झील की खोज का श्रेय उन भेड़ बकरी पलकों को जाता है जो यहाँ भेड़ और बकरियों को यहाँ चराने आते थे ! समतल मैदान होने के कारण इन पशु पालकों ने यहाँ पर खेती करने की सोची ! खेती करते समय उन पशु पालकों को यहाँ ठंडे इलाके के बाबजूद सांप नज़र आते थे ! वे उन साँपों को मरने का प्रयास करते तो वो वही पर लुप्त हो जाते थे ! इतना होने पर भी वे पशु पालक वहां पर खेती करते रहे ! एक दिन खेती करते समय एकाएक 18 जोड़ी बैल मैदान के मध्य छिद्र हो जाने से वहा उत्पन हुई जलधारा में समां गए ! इस जलधारा से मैदान पानी से पूरा भर गया ! मान्यता है की इस दृश्य को देखने वाले अभी हैरान परेशां ही थे की वहा नाग देवता जी की प्रतिमा उभर आई ! लोगों ने इसे देव चमत्कार मानते हुए नाग देवता की स्थापना यहाँ कर दी ! आज भी नाग देवता का मंदिर यहाँ पर आलोकिक है और लोगो में बेहद मान्यता है !

उस समय उस चमत्कार में गायब हुए चरवाहे औए बैल सैंज के समीप केपु गाँव में निकले ! यह सब केसे हुआ इसे देव चमत्कार ही माना जाता है !इसके प्रमाण आज भी केपु के मंदिर में देखे जा सकते है !
हर वर्ष यहाँ पर मई मास में 31तारीख के आस पास मेले का आयोजन किया जाता है जो की लगभग तीन दिनों तक चलता है इस मेले में चतुर्मुखी देवता मेलन मेले की शोभा बढाते है ! इस मेले में दूर दूर से श्रद्धालु दर्शनों के लिए आते है ! स्थानीय स्थाई निवासी इस मेले में ज़रूर शिरकत करते है। झील के चारो ओर देवदार के वृक्ष इस स्थल की सुन्दरता को और भी बढ़ा देते है ! ठंडी ठंडी हवा वातावरण को और भी सुहावना बना देती है ! इस मेले में खेल कूद प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है जिसमें वोल्ली बाल क्रिकेट इत्यादि प्रतियोगिता प्रमुख है !
कुछ भी कहा जाये परन्तु आज भी पुरातन काल में हुए इन चमत्कारों के प्रमाणों को देख कर लोग चकित रह जाते है ! इस क्षेत्र का प्राकृतिक सोंदर्य अद्भुत तो है ही और पर्यटकों को आकर्षित भी करता है ! आवश्यकता है इस क्षेत्र को और अधिक विकसित करने की क्योंकि यहाँ पर्यटन की आपार संभावनाएं है !

शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

ग़ज़ल

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पत्ते जीवन के कब बिखर जाए क्‍या मालूम
शाम जीवन की कब हो जाए क्‍या मालूम

बन्‍द हो गए है रास्‍ते सभी गुफतगू के
अब वहां कौन कैसे जाए क्‍या मालूम

झूठ पर कर लेते है विश्‍वास सब
सच कैसे सामने आए क्‍या मालूम

दो मुहें सापों से भरा है आस पास
दोस्‍त बन कौन डस जाए क्‍या मालूम

विक्षिप्‍त की दुनिया है बेतरतीव बेरंग
कोई संगकार सजा जाए क्‍या मालूम

मंगलवार, मार्च 08, 2011

महिला दिवस

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आज अन्‍तरराष्‍ट्रीय महिला दिवस है। सौ वर्षो पुरानी इस परम्‍परा का आरम्‍भ बीसवीं शताब्‍दी में ही हो गया था। 1908 में न्‍यूयार्क सिटी में कामकाजी महिलाओं ने अपनी मांगों को लेकर रैली का आयोजन किया था।  यह प्रयास  महिलाओं को वोट का अधिकार देने के लिए किया गया था।पहला महिला दिवस  मनाने की घोषणा 28 फरवरी 1909 को अमेरिकी समाजवादी पार्टी ने की थी।   इसके बाद इसे फरवरी के अन्तिम रविवार को मनाया जाने लगा। 1910 में कोपेनहेगन के सोशलिस्‍ट इंटरनेशनल के सम्‍मेलन में इसे अंतर्राष्‍ट्रीय दर्जा दिया गया।  1917 मे रूस की महिलाओं ने महिला दिवस पर रोटी कपड़ा के लिए हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया । जो एक ऐतिहासिक निर्णय था। ग्रेगेरियन कैंलेण्‍डर के अनुसार यह दिन 8 मार्च का था और इसलिए इस दिन को महिला दिवस के रूप में घोषित किया गया।  संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ने 1975 को महिला वर्ष घोषित किया था और इस दिवस को आधिकारिक स्‍वीकृति प्रदान की गई थी।

गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

हिमप्रस्‍थ का जनवरी 2011

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हिमप्रस्‍थ के जनवरी 2011 के अंक में डा0 अम्बिका घेजटा का लेख सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना की कविताओं में ग्रामिण बोध की अभिव्‍यक्ति पठनीय लेख है। इसके अतिरिक्‍त प्रो0 डा0 यशवंतकर संतोष कुमार का लेख भारतीय समाजशास्‍त्र संग्रहीय लेख है। अन्‍य लेख में सुदर्शन वशिष्‍ठ, राजेन्‍द्र राजन, आंकाक्षा यादव, सीता राम गुप्‍ता, जितेन्‍द्र कुमार, डा0 शशि भूषण, सत्‍यनारायण भटनागर, और बी0डी0 शर्मा के आलेख महत्‍वपूर्ण है। डा0 मदन मोहन वर्मा की कहानी स्‍वतंत्र है अब हम प्रभावित करती है। अन्‍य कहानियों में डा0 लीला मोदी और साधु राम दर्शक की कहानियां पठनीय है। इस अंक में डा0 सुरेश उजाला और अंकुश्री की लघुकथाओं के साथ साथ राम नारायण हलधर, राजीव कुमार त्रिगर्ती, महेन्‍द्र सिंह शेखावत उत्‍साही, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, ज्ञान चन्‍द शर्मा, डा0 जगदीश चन्‍द्र शर्मा और शंकर सुल्‍तानपुरी की कवितायें पठनीय है। सुरेश आनन्‍द का व्‍यंग्‍य सुबह का भविष्‍यफल पठनीय है। हिमप्रस्‍थ के इस अंक में डा0 रमेश सोबती ने सुकृति भठनागर के काव्‍य संग्रह अनुगूंज और डा0 जगन सिंह ने डा0 अरूण कुमार की पुस्‍तक पालिटिकल मार्केटिंग इन इण्डिया की समीक्षा प्रस्‍तुत की है।
सम्‍पर्क :संपादक, रणजीत सिंह राणा, हिमप्रस्‍थ सम्‍पादकीय कार्यालय, हि0प्र0 प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चौकी, शिमला -171005

सोमवार, जनवरी 31, 2011

भारत की हिंदी लघुकथाएं

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पेशे से चिकित्सक डॉ. रामकुमार घोटड़ ने साहित्य के क्षेत्र में लघुकथा पर वृहद और कई महत्वपूर्ण कार्य किया है और अब तक उन्हें 22 पुस्तकों में समेटा है। इसी श्रृंखला में सद्य-प्रकाशित पुस्तक ‘भारतीय  हिन्दी लघुकथाएं’ इस मायने में ध्यान खींचती है कि इसमें देश  के लगभग हर प्रान्त के हिन्दी लघुकथाकारों की लघुकथाएं समाहित हैं और लघुकथा के सभी दिग्गज इसमें शामिल हैं। यह संकलन दो खंडों में है। ‘विरासत के धनी’ नामक पहले खंड में भारतेंदु हरिश्चंद्र , माधव राव सप्रे, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद , पदुमलाल पन्नालाल बक्षी, उपेन्द्रनाथ अश्करावी और विष्णु  प्रभाकर जैसे मूर्धन्य व अग्रज लेखकों की एक-एक लघुकथाएं संकलित हैं जबकि दूसरे खंड का नाम ‘विरासत के कर्णधार’ रखा गया है। इसमें लगभग वे सभी आधुनिक लेखक हैं जिन्होंने राष्ट्रीय  स्तर पर लघुकथा क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनायी है। इन लघुकथाकारों की तीन-तीन लघुकथाएं इसमें शामिल की गई हैं। डा. घोटड़ के अनुसार प्रथम व द्वितीय खंड में पुस्तक को विभक्त करने का उद्देष्य यह है कि पाठक पूर्ववर्ती ओर वर्तमान में लिखी जा रही लघुकथाओं से गुजरकर उनका पठनीय रसास्वादन और तात्विक मूल्यांकन कर सके।
यह कहना गलत नहीं होगा कि 1942 में बुद्धिनाथ झा ‘कैरव’ द्वारा नामांकित लघुकथा आज साहित्य की एक सशक्त और स्वीकृत विधा है तथा अन्य विधाओं की तरह देश -विदेश  में इस पर प्रयोग होते आ रहे हैं। फिर भी लघुकथा का मार्मिक प्रभाव इसके कम और उद्वेलित करने वाले शब्दों के कारण अधिक है। इसी से सार्थक लघुकथाएं हमेश  मानस-पटल पर लम्बे समय के लिए अंकित हो जाती हैं। उदाहरण के तौर पर इसी पुस्तक के प्रथम खंड में संकलित भारतेन्दु हरिश्चंद्र  (1850-1885) की लघुकथा ‘अंगहीन धनी’ को लिया जा सकता है।
‘‘एक  धनिष्ट के घर उसके बहुत से प्रतिष्ठित  व्यक्ति बैठे थे। नौकर बुलाने की घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा,  पर हंसता हुआ लौटा। दूसरे नौकरों ने पूछा, ‘क्यों हंस रहे हो?’ तो उसने जवाब दिया, ‘भाई सोलह हट्टे-कट्टे जवान थे। उनसे एक बत्ती न बुझे, जब हम गए तो बुझे।’
मानव-मन के विभिन्न धरातलों पर रचे गए इस संकलन की लघुकथाओं को पढ़ते हुए ऐसे ही कई अनुभव, संप्रेषण और भाव जगते हैं। इनमें कहीं दुःख की नदी बहती है तो कहीं सुख का झरना। कहीं विसंगतियां हैं तो कहीं मुखौटा ओढ़े आदमी का चेहरा-दर-चेहरा। भूख की त्रासदी, गरीब-मजदूरों, किसानों की व्यथा, नेताओं का दोगलापन, राजनीति का भ्रष्ट आचरण, पुलिस के चेहरे, औरतों व बच्चों का शोषण -उत्पीड़न, व्यवस्था के डगमगाते रूप आदि जीवन के सभी पहलू यहां देखने को मिलते हैं तो साथ ही इनसे उभरती उम्मीद की किरणें। कथा-कहानियों  और यहां तक कि मीडिया में भी पुलिस का भ्रष्ट चेहरा ही दिखाया जाता है और उन पर लघुकथाएं भी खूब लिखी गई हैं, पर इस संकलन में पुलिस का सकारात्म पक्ष उनके अंदर के इंसानियत को दर्शाता है। अशोक भाटिया की लघुकथा ‘प्रतिक्रिया’, विजय रानी बंसल की ‘पुलिस’ और प्रताप सिंह सोढी की 'दुविधा' ऐसी  ही लघुकथाएं हैं। महेन्द्र सिंह महलान ने ‘झंडा’ में व्यवस्था का क्रूर उदाहरण प्रस्तुत किया है तो जयप्रकाश मानस  ने ‘वोट’ के अंतर्गत यह दर्शाया  है कि भूखे-मजदूरों को आर्थिक सहायता देने की बात हो तो वे भी यही समझते हैं कि चुनाव आने वाला है। लघुकथा क्षेत्र में नेताओं की छवि आजतक सुधर नहीं पायी जिसका मुख्य कारण हमारा भ्रष्टतंत्र ही है। ‘विजय-जुलूस‘(रामेश्वर कम्बोज 'हिमांशु'), ‘राजनीति’(सुरेन्द्र मंथन), ‘सियासत’(जसबीर चावला), ‘चुनाव’ ’(शंकर पुणतांबेकर), ‘चुनाव से पहले’ ’(महेश राजा), ‘लोकतंत्र‘ ’(अमरनाथ चौधरी अब्ज) आदि लघुकथाएं इसी ओर इशारा करती हैं। सुकेश साहनी, महेन्द्र सिंह महलान और धर्मपाल साहिल की लघुकथाएं बच्चों का मनोविज्ञान प्रस्तुत करने में सफल रही हैं तो सुदर्शन वशिष्ठ, डा. किशोर काबरा और युगल ने बुजुर्गों की व्यथा को उकेरा है। सफर में घटने वाली घटनाओं को माध्यम बनाकर कई उम्दा लघुकथाएं लिखी गई हैं जो इस संग्रह की पठनीयता को बरकरार रखती हैं। हीर के सुरीले बोल सुनते हुए एक पाकिस्तानी किसान कब देश  की सीमा पार कर गया, उसे पता ही नहीं चला। इसे श्याम सुन्दर दीप्ति ने बहुत ही खूबसूरत ढंग से अपनी लघुकथा ‘हद’ में कलमवद्ध किया है। इसी तरह रोशन विक्षिप्त की चार वाक्यों की लघुकथा ‘निर्णय’ एक विसंगति की ओर इशारा करती है--- वह शक के आधार पर पकड़ा गया था। अपने पक्ष में गवाह प्रस्तुत न कर पाने के कारण उसे सात साल कैद का निर्णय दिया गया। जेल में अच्छे आचरण के कारण उसे अवधि से पहले रिहा करने का निर्णय लिया गया।
संकलन में इस तरह की कम शब्दों की लघुकथाएं बहुत मारक हैं। डा. राजेन्द्र सोनी की लघुकथा ‘गांधी के प्रतीक बंदर’ यों उभरा है ---इक्कीसवीं सदी प्रारम्भ हुई और गांधी जी के तीनों बंदरों ने अपने-अपने हाथ हटा लिए। आखिर ऐसा क्यों....?  पूछने पर समवेत स्वर सुनाई दिया, अब जीवन में ऐसी गलती नहीं करेंगे।
दफ्तरी व्यवस्था पर बलराम अग्रवाल (बिना नाल का घोड़ा), और डा0 सतीशराज पुश्करणा (बीती विभावरी) की लघुकथाएं अच्छी बन पड़ी हैं तो श्याम सुन्दर अग्रवाल (स्कूल), डा. रूप देवगुण (लक्ष्मी), डा. योगेन्द्रनाथ शुक्ल  (शिकार), मधुकांत (मेरा अध्यापक), शिक्षा-व्यवस्था की पड़ताल करते नजर आते हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि संकलन में कई अच्छे लघुकथाकार छूट गए हैं और महिला लघुकथाकार भी गिनती के हैं। महिला लघुकथाकारों में डा. आभा झा, डा. आशा पुष्प, मालती वसंत, सुरभि रैना बाली, विजय रानी बंसल और पुष्पलता कश्यप ही हैं। चर्चित लघुकथाकारों में कमल चोपड़ा, कमलेश भारतीय, डा0 रामनिवास मानव, घनश्याम अग्रवाल, भगवान वैद्य प्रखर, भगीरथ, राजेन्द्र सोनी, विक्रम सोनी
रामयतन यादव, तारिक असलम ‘तस्नीम’ आदि भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। हालांकि पुस्तक संग्रहणीय है पर लघुकथाओं के चुनाव में भी डा. घोटड़ कहीं-कहीं चूकते नजर आते हैं।
पु स्तकः भारत की हिन्दी लघुकथाएंः डा.राम कुमार घोटड़
प्रकाशकः मंजुली प्रकाशन, पी-4, पिलंजी सरोजिनी नगर,
नई दिल्ली-110023
मूल्यः 400 रुपए


साभार :  रतन चन्‍द रत्‍नेश

सोमवार, जनवरी 24, 2011

राष्‍ट्रगान

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राष्‍ट्रगान जन गण मन को सविंधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को राष्‍ट्रगान के रूप में स्‍वीकार किया था। गुरूदेव रवींन्‍द्र नाथ टैगोर द्वारा लिखित यह गीत सबसे पहले 27 दिसम्‍बर 1911 को कलकता में हुए भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। इसमें पांच अंतरे है इसका पहला अंतरा राष्‍ट्रगान के रूप में गाया जाता है।
राष्‍ट्रगान का गायन समय 52 सैकंड है विशेष अवसरों पर शुरू और अंत की पंक्तियों को भी लघु राष्‍ट्रगान के रूप में गाया जाता है जिसका समय 20 सैकंड होता है। जब कहीं राष्‍ट्रगान गाया जा रहा हो तो प्रत्‍येक भारतीय नागरिक का कर्तव्‍य है कि वह सावधान की अवस्‍था में खड़े हो कर राष्‍ट्रगान को पूर्ण सम्‍मान दे।
 
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