शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010
नव वर्ष मंगलमय हो
सभी मित्रों को नववर्ष की अनेकानेक मंगलकामनायें। वर्ष 2011 आप सभी के जीवन में नई रौशनी और समृद्धि ले कर आए यही मनोकामना है।
किंकरी देवी की पुण्य तिथि
आज 31 दिसम्बर है । आज प्रसिद्ध पर्यावरणविद किंकरी देवी की पुण्य तिथि है। आज ही के दिन 2007 को उनका स्वर्गवास हुआ था। किंकरी देवी ने सिरमौर में खदान माफिया के खिलाफ आवाज उठाई थी । उन्हे 2001 में रानी झांसी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। सिरमौर के संगड़ाह में उच्च शिक्षा के लिए उन्होने 2002 में आवाज उठाई और संगड़ाह में 2005 में महाविद्यालय स्थापित हुआ।
सोमवार, दिसंबर 13, 2010
यह क्या हो रहा ?

यह क्या हो रहा है आज सामान लेने बाजार गया तो दुकानदार ने दस का यह नोट दिखाया जिसके दोनो तरफ पूरे इत्मीनान के साथ चित्रकारी कर रखी थी । आप इस नोट की दुर्दशा देख कर अन्दाजा लगा सकते है इस चित्रकारी करने में व्यक्ति को कितना समय लगा होगा। अब प्रश्न यह है कि करंसी को खराब करने वालों पर क्या कार्रवाही होनी चाहिए। राष्ट्रीय प्रतीक चिन्हों को सहेजना हमारा कर्तव्य है तो आदमी करंसी को खराब क्यों करते है । नोटों पर चित्रकारी करना अपना फोन नम्बर या नाम लिखना क्या अपराध की श्रेणी में नहीं आता । शायद हम ईमानदार नहीं है तभी तो अपने राष्ट्रीय प्रतीकों को खराब करने में हमें आनन्द आता है । क्या हम कभी सुधरेगें भी या नहीं शायद हम नहीं सुधरेगे।शुक्रवार, दिसंबर 10, 2010
आभार, जगदीश बाली जी
आजकल पारिवारिक व्यस्तता के कारण अपने ब्लोग पर लेखन कम हो पा रहा है। आज यह सोच कर ब्लोग पर आया की कल दूसरा शनिवार है और कार्यालय में अवकाश रहेगा सुबह जल्दी ना भी उठा तो कोई समस्या नहीं। अपने ब्लोग पर पहुंचते ही टिप्पणीयां देखी तो जगदीश बाली जी आभार युक्त टिप्पणी पाई। बाली जी ने एक वर्ष पूर्व ब्लोगिंग शुरू की थी। उनका ब्लाग तैयार करने और प्रारम्भिक जानकारी देने में ही मैंने आंशिक सहायता की थी और आज उनका आभार मिला तो अच्छा लगा। जगदीश जी ब्लोग पर सक्रिय है यह मुझे सुखद आभास देता है काफी मित्रों के ब्लोग पिछले दो तीन वर्षो में बनाए है उनमें कुछ ही सक्रिय है। कुछ कभी कभार सम्पर्क कर लेते है अधिकतर भूल गए है। ऐसे वातावरण में बाली जी ने याद किया यह बेहद सुखद लगा। बाली जी ब्लोगिंग की वर्षगांठ पर आपको बधाई और भविष्य के लिए आपको अनेकानेक मंगलकामनायें। बाली जी के दो ब्लोग है हिन्दी में क्षितिज और अंग्रेजी में Delving Deep into Eternity
शनिवार, नवंबर 27, 2010
बमबज़र पर बातचीत
कल सांय बमबज़र पर समीरजी बलाल जी सलील जी और गिरीश जी की लाईब बातचीत से लाभान्वित हुआ । यह एक सराहनीय प्रयास है। गिरीश जी आप बधाई के पात्र है कि आपने इतनी सुन्दर बातचीत आयोजित की। कृपया नये लोगो को भी मार्गदर्शन करे की इस तरह की बातचीत में किस प्रकार से जुड़ा जा सकता है। आगामी प्रसारण की अग्रिम सूचना देंगे तो आभारी रहूंगा। पुन आप सभों का आभार।
गुरुवार, नवंबर 18, 2010
आज के लिये इतना ही
इस ब्लोग पर काफ़ी समय से मात्र एक प्रारम्भिक रचना अखर रही थी सोचा कुछ लिखा जाये! क्या लिखा जाये यही सोचता रहा! अन्ततः ब्लोगिग कैसे शुरु की इस पर ही कुछ लिखा जाये! आस पास ब्लोगिग का वातावरण नहीं था! लोगों के ब्लोग देखता पढता! आपना ब्लोग कब और कैसे शुरु किया जाये कुछ मालूम नहीं! अध्यापन से जुडा होने के कारण संघ का ब्लोग बना हुआ था! संघ की सभी सूचनायें इसी पर मिलती थी! तो प्रधान जी से पूछा की कैसे ब्लोग बनाया जाये! उन्होने पूरी जानकारी दी! और अपने स्कूल का ब्लोग बना डाला! साहित्यिक अभिरुचि होने के कारण आपना ब्लोग भी बना दिया! ब्लोगिग की पहली कक्षा मे प्रवेश तो हो गया! अब अध्यय्न शुरू किया गया! गूगल पर जा कर टाईप किया ब्लोगिग हिन्दी टिप्स तो जो मिला वो प्यासे को पानी की तरह था वह ब्लोग था अशीष खाण्डेलवाल जी का! पढना शुरु किया तो ब्लोगिग की वास्तविक शिक्षा शुरु हो गई! हिन्दी टिप्स से वो सभी कुछ सिखा जो मैं आज थोडा कुछ कर पाता हूं! धन्यवाद टिप्स यात्रा ! चलती रही और अनेक ब्लोग पढता गया ! इसमें मै अपने ब्लोग पर रचनाये कम ही दे पाया परन्तु मुझे ब्लोगिग की शिक्षा मिलती चली गई! यह सिलसिला अभी भी जारी है! यह ब्लोग वाणी बनाने के पीछे कारण था की हिन्दी के अच्छे और प्रेरणादायक , साहित्यिक शैक्षिक ब्लोग पर लिखा जाये परन्तु जब अन्तर्जाल पर विचरण करता रहा तो पाया की ऐसे ब्लोग तो पहले से ही बने है और उन पर अच्छी जानकारी उपलब्ध है तो मैं एक नया ब्लोग बना कर क्या करुगा! सोचा डिलीट कर दिया जाये ! तो सरिता जी की एक टिप्पणी पर नज़र पडी तो विचार त्याग कर कुछ लिखने का मन बन लिया! यह ब्लोग मेरे एक मित्र ने बनाया था मज़ाक मज़ाक में, मज़ाक मज़ाक में स्वागत भी हो गया और ये कथा भी लिख दी! किसी ने बताया कि इन्टरनेट से आमदनी भी हो सकती है! और मैं कहां पहुच गया यह अगली बार! खैर आज के लिये इतना ही फ़िर मिलता हूं एक नये ब्लोग की चर्चा के साथ जिसने मुझे प्रेरित किया!
आज के लिये इतना ही
इस ब्लोग पर काफ़ी समय से मात्र एक प्रारम्भिक रचना अखर रही थी सोचा कुछ लिखा जाये! क्या लिखा जाये यही सोचता रहा! अन्ततः ब्लोगिग कैसे शुरु की इस पर ही कुछ लिखा जाये! आस पास ब्लोगिग का वातावरण नहीं था! लोगों के ब्लोग देखता पढता! आपना ब्लोग कब और कैसे शुरु किया जाये कुछ मालूम नहीं! अध्यापन से जुडा होने के कारण संघ का ब्लोग बना हुआ था! संघ की सभी सूचनायें इसी पर मिलती थी! तो प्रधान जी से पूछा की कैसे ब्लोग बनाया जाये! उन्होने पूरी जानकारी दी! और अपने स्कूल का ब्लोग बना डाला! साहित्यिक अभिरुचि होने के कारण आपना ब्लोग भी बना दिया! ब्लोगिग की पहली कक्षा मे प्रवेश तो हो गया! अब अध्यय्न शुरू किया गया! गूगल पर जा कर टाईप किया ब्लोगिग हिन्दी टिप्स तो जो मिला वो प्यासे को पानी की तरह था वह ब्लोग था अशीष खाण्डेलवाल जी का! पढना शुरु किया तो ब्लोगिग की वास्तविक शिक्षा शुरु हो गई! हिन्दी टिप्स से वो सभी कुछ सिखा जो मैं आज थोडा कुछ कर पाता हूं! धन्यवाद टिप्स यात्रा ! चलती रही और अनेक ब्लोग पढता गया ! इसमें मै अपने ब्लोग पर रचनाये कम ही दे पाया परन्तु मुझे ब्लोगिग की शिक्षा मिलती चली गई! यह सिलसिला अभी भी जारी है! यह ब्लोग वाणी बनाने के पीछे कारण था की हिन्दी के अच्छे और प्रेरणादायक , साहित्यिक शैक्षिक ब्लोग पर लिखा जाये परन्तु जब अन्तर्जाल पर विचरण करता रहा तो पाया की ऐसे ब्लोग तो पहले से ही बने है और उन पर अच्छी जानकारी उपलब्ध है तो मैं एक नया ब्लोग बना कर क्या करुगा! सोचा डिलीट कर दिया जाये ! तो सरिता जी की एक टिप्पणी पर नज़र पडी तो विचार त्याग कर कुछ लिखने का मन बन लिया! यह ब्लोग मेरे एक मित्र ने बनाया था मज़ाक मज़ाक में, मज़ाक मज़ाक में स्वागत भी हो गया और ये कथा भी लिख दी! किसी ने बताया कि इन्टरनेट से आमदनी भी हो सकती है! और मैं कहां पहुच गया यह अगली बार! खैर आज के लिये इतना ही फ़िर मिलता हूं एक नये ब्लोग की चर्चा के साथ जिसने मुझे प्रेरित किया!
सोमवार, नवंबर 15, 2010
भारत का हिंदी लघु कथा संसार
लघुकथा वर्तमान में साहित्य में एक सशक्त विधा के रूप में स्थापित है! आम पाठक की रूचि लघुकथाओ में बनी है ! लघु कथाओं को लेकर कई पुस्तके बाज़ार में आ रही है ! मुझे स्वयं लघुकथाओं में रूचि है तो इससे जुढ़ी पुस्तके पढ़ता रहता हू ! इस मध्य डा० राम कुमार घोटड की पुस्तक भारत का हिंदी लघुकथा संसार आई है जिसमे १२ राज्यों के लघुकथा लेखन पर प्रकाश डाला गया है ! डॉ० घोटड एम् बी बी एस , एम् एस है और आज कल राजस्थान चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत है ! इस पुस्तक में राजस्थान डा० राम कुमार घोटड, बिहार -सतीशराज पुष्करणा- रामयतन प्रसाद यादव , मध्य प्रदेश -मालती बसंत , हरियाणा - प्रो रूप देवगुण , उत्तर प्रदेश - रामेश्वर कम्बोज हिमांशु , दिल्ली - हरनाम शर्मा , झारखण्ड-डा अमर नाथ चौधरी अब्ज , छतीसगढ़ -डा राजेंदर सोनी , हिमाचल प्रदेश- रतन चंद रत्नेश , पंजाब- श्याम सुन्दर अगरवाल , गुजरात- प्रो मुकेश रावल और महाराष्ट्र- डा० राम कुमार घोटड ने इन राज्यों में लघुकथा लेखन पर प्रकाश डाला है ! इसके अलावा हिंदी लघुकथा के इतिहास पर महत्त्व पूर्ण आलेख है ! इस पुस्तक की विशेषता है की इसमे उन ४३ लोगो के नाम दिए गए है जिन्होंने हिंदी लघुकथाओ पर पी एच डी और एम् फिल की उपाधि प्राप्त की है ! १६३ पृष्ठों की यह पुस्तक पाठको के लिए बेहद ही लाभप्रद है ! साहित्यागार , जयपुर द्वारा प्रकशित इस पुस्तक की छपाई सुन्दर है तथा मुद्रण में गलतिया नहीं है ! पुस्तक प्राप्त करने वाले इच्छुक डा० राम कुमार घोटड से सादलपुर ( राजगढ़ ), जिला चुरू राजस्थान ३३१०२३ फोन ०१५५९ २२४१०० निवास मोबाइल ०९४१४०८६८०० पर संपर्क कर सकते है !
रविवार, नवंबर 14, 2010
जवाहर लाल नेहरू
आज बाल दिवस है सभी विद्यार्थियों को उज्जवल भविष्य के लिए अनेकानेक मंगलकामनायें। बाल दिवस जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है । प्रस्तुत है नेहरू जी का जीवन परिचय ।
जवाहर लाल नेहरू का जन्म इलाहाबाद में एक धनाढ्य वकील मोतीलाल नेहरू के घर हुआ था। उनकी माँ का नाम स्वरूप रानी नेहरू था। वह मोतीलाल नेहरू के इकलौते पुत्र थे। इनके अलावा मोती लाल नेहरू को तीन पुत्रियां थीं। नेहरू कश्मीरी वंश के सारस्वत ब्राह्मण थे। जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया के कुछ बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से, और कॉलेज की शि़क्षा ट्रिनिटी कॉलेज, लंदन से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। इंग्लैंड में उन्होंने सात साल व्यतीत किए जिसमें वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित किया। जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रूल लीग में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में हुई जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट अधिनियम के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण, सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए। गांधी ने भी युवा जवाहरलाल नेहरू में भारत का भविष्य देखा और उन्हें आगे बढने के लिए प्रेरित किया। नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार अपने परिवार को भी ढाल लिया। जवाहरलाल और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपडों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया। वे अब एक खादी कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने लगे। जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। जवाहरलाल नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा की। यह उनके लिए एक मूल्यवान प्रशासनिक अनुभव था जो उन्हें तब काम आया जब वह देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने अपने कार्यकाल का इस्तेमाल सार्वजनिक शिक्षा के विस्तार, स्वास्थ्य की देखभाल और स्वच्छता के लिए किया। 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया.
1926 से 1928 तक, जवाहर लाल ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव के रूप में सेवा की। 1928-29 में, कांग्रेस के वार्षिक सत्र का आयोजन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया। उस सत्र में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस ने पूरी राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग का समर्थन किया, जबकि मोतीलाल नेहरू और अन्य नेताओं ने ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ही प्रभुत्व सम्पन्न राज्य का दर्जा पाने की मांग का समर्थन किया। मुद्दे को हल करने के लिए, गांधी ने बीच का रास्ता निकाला और कहा कि ब्रिटेन को भारत के राज्य का दर्जा देने के लिए दो साल का समय दिया जाएगा और यदि ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए एक राष्ट्रीय संघर्ष शुरू करेगी। नेहरू और बोस ने मांग की कि इस समय को कम कर के एक साल कर दिया जाए। ब्रिटिश सरकार ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। दिसम्बर 1929 में, कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित किया गया जिसमें जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसी सत्र के दौरान एक प्रस्ताव भी पारित किया गया जिसमें भारत की स्वतंत्रता की मांग की गई। 26 जनवरी, 1930 को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया। गांधी जी ने भी 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया। आंदोलन खासा सफल रहा और इसने ब्रिटिश सरकार को प्रमुख राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया ! जब ब्रिटिश सरकार ने भारत अधिनियम 1935 प्रख्यापित किया तब कांग्रेस पार्टी ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। नेहरू चुनाव के बाहर रहे लेकिन ज़ोरों के साथ पार्टी के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया। कांग्रेस ने लगभग हर प्रांत में सरकारों का गठन किया और केन्द्रीय असेंबली में सबसे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की। नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए 1936, 1937 और 1946 में चुने गए थे, और राष्ट्रवादी आंदोलन में गांधी के बाद द्वितीय स्थान हासिल किया। उन्हें 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया और 1945 में छोड दिया गया। 1947 में भारत और पाकिस्तान की आजादी के समय उन्होंने अंग्रेजी सरकार के साथ हुई वार्ताओं में महत्वपूर्ण भागीदारी की। 1947 में वे स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। अंग्रेजों ने करीब 500 देशी रियासतों को एक साथ स्वतंत्र किया था और उस वक्त सबसे बडी चुनौती थी उन्हें एक झंडे के नीचे लाना। उन्होंने भारत के पुनर्गठन के रास्ते में उभरी हर चुनौती का समझदारी पूर्वक सामना किया। जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. उन्होंने योजना आयोग का गठन किया, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित किया और तीन लगातार पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया। उनकी नीतियों के कारण देश में कृषि और उद्योग का एक नया युग शुरु हुआ। नेहरू ने भारत की विदेश नीति के विकास में एक प्रमुख भूमिका निभाई। जवाहर लाल नेहरू ने जोसेफ ब्रॉज टीटो और अब्दुल गमाल नासिर के साथ मिलकर एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए एक निर्गुट आंदोलन की रचना की। वह कोरियाई युद्ध का अंत करने, स्वेज नहर विवाद सुलझाने, और कांगो समझौते को मूर्तरूप देने जैसे अन्य अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में मध्यस्थ की भूमिका में रहे। पश्चिम बर्लिन, ऑस्ट्रिया, और लाओस के जैसे कई अन्य विस्फोटक मुद्दों के समाधान में पर्दे के पीछे रह कर भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्हें वर्ष 1955 में भारत रत्न से सम्मनित किया गया। लेकिन नेहरू पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंधों में सुधार नहीं कर पाए। पाकिस्तान के साथ एक समझौते तक पहुँचने में कश्मीर मुद्दा और चीन के साथ मित्रता में सीमा विवाद रास्ते के पत्थर साबित हुए। नेहरू ने चीन की तरफ मित्रता का हाथ भी बढाया, लेकिन 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। नेहरू के लिए यह एक बड़ा झटका था और शायद उनकी मौत भी इसी कारण हुई। 27 मई, 1964 को जवाहरलाल नेहरू को दिल का दौरा पडा जिसमें उनकी मृत्यु हो गई.
मंगलवार, नवंबर 02, 2010
संयम का महत्व
इंद्रियों के संयम को जीवन की सफलता का प्रमुख साधना कहा है। नारद उपदेश देते हुए कहते हैं, ‘इंद्रियों का आवश्यक कर्मों को संपन्न करने में कम से कम उपयोग करना चाहिए। मन पर नियंत्रण करके ही इंद्रिय-संयम संभव है। वाणी का जितना हो सके, कम उपयोग करने में ही कल्याण है।’ वाणी के संयम के अनेक प्रत्यक्ष लाभ देखने में आते हैं। वाणी पर संयम करने वाला किसी की निंदा के पाप, कटु वचन बोलकर शत्रु बनाने की आशंका, अभिमान जैसे दोषों से बचा रहता है। एक बार बुद्ध मौन व्रत का पालन करते समय एकाग्रचित बैठे हुए थे। उनसे द्वेष रखने वाला एक कुटिल व्यक्ति उधर से गुजरा। उसके मन में ईर्ष्या भाव पनपा-उसने वृक्ष के पास खड़े होकर बुद्ध के प्रति अपशब्दों का उच्चारण किया। बुद्ध मौन रहे। उन्हें शांत देखकर वह वापस लौट आया। रास्ते में उसकी अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा- एक शांत बैठे साधु को गाली देने से क्या मिला? वह दूसरे दिन पुनः बुद्ध के पास पहुंचा। हाथ जोड़कर बोला, ‘मैं कल अपने द्वारा किए गए व्यवहार के लिए क्षमा मांगता हूं।’ बुद्ध ने कहा, ‘कल जो मैं था, आज मैं वैसा नहीं हूं। तुम भी वैसे नहीं हो। क्योंकि जीवन प्रतिफल बीत रहा है। नदी के एक ही पानी में दोबारा नहीं उतरा जा सकता। जब वापस उतरते हैं, वह पानी बहकर आगे चला जाता है। कल तुमने क्या कहा, मुझे नहीं मालूम। और जब मैंने कुछ सुना ही नहीं, तो वे शब्द तुम्हारे पास वापस लौट गए।’ बुद्ध के शब्दों ने उसे सहज ही वाणी के संयम का महत्व बता दिया
सोमवार, नवंबर 01, 2010
सुक्ति - संकल्प
संकल्प अपने भीतर किसी नई शक्ति को जन्म देता है। लेकिन दमन अपने भीतर पुरानी कामनाओं की शक्ति को दबाता है। - ओशो
विश्वास और श्रद्धा
भगवान बुद्ध धर्म प्रचार करते हुए काशी की ओर जा रहे थे। रास्ते में जो भी उनके सत्संग के लिए आता, उसे वह बुराइयां त्यागकर अच्छा बनने का उपदेश देते। उसी दौरान उन्हें उपक नाम का एक गृहत्यागी मिला। वह गृहस्थ को सांसारिक प्रपंच मानता था और किसी मार्गदर्शक की खोज में था। भगवान बुद्ध के तेजस्वी व निश्छल मुख को देखते ही वह मंत्रमुग्ध होकर खड़ा हो गया। उसे लगा कि पहली बार किसी का चेहरा देखकर उसे अनूठी शांति मिली है। उसने अत्यंत विनम्रता से पूछा, ‘मुझे आभास हो रहा है कि आपने पूर्णता को प्राप्त कर लिया है?’ बुद्ध ने कहा, ‘हां, यह सच है। मैंने निर्वाणिक अवस्था प्राप्त कर ली है।’
उपक यह सुनकर और प्रभावित हुआ। उसने पूछा, ‘आपका मार्गदर्शक गुरु कौन है?’ बुद्ध ने कहा, ‘मैंने किसी को गुरु नहीं बनाया। मुक्ति का सही मार्ग मैंने स्वयं खोजा है।’
‘क्या आपने बिना गुरु के तृष्णा का क्षय कर लिया है?’
बुद्ध ने कहा, ‘हां, मैं तमाम प्रकार के पापों के कारणों से पूरी तरह मुक्त होकर सम्यक बुद्ध हो गया हूं।’
उपक को लगा कि बुद्ध अहंकारवश ऐसा दावा कर रहे हैं। कुछ ही दिनों में उसका मन भटकने लगा। एक शिकारी की युवा पुत्री पर मुग्ध होकर उसने उससे विवाह कर लिया। फिर उसे लगने लगा कि अपने माता-पिता व परिवार का त्यागकर उनसे एक प्रकार का विश्वासघात किया है। वह फिर बुद्ध के पास पहुंचा। संशय ने पूर्ण विश्वास व श्रद्धा का स्थान ले लिया। वह बुद्ध की सेवा-सत्संग करके स्वयं भी मुक्ति पथ का पथिक बन गया।
उपक यह सुनकर और प्रभावित हुआ। उसने पूछा, ‘आपका मार्गदर्शक गुरु कौन है?’ बुद्ध ने कहा, ‘मैंने किसी को गुरु नहीं बनाया। मुक्ति का सही मार्ग मैंने स्वयं खोजा है।’
‘क्या आपने बिना गुरु के तृष्णा का क्षय कर लिया है?’
बुद्ध ने कहा, ‘हां, मैं तमाम प्रकार के पापों के कारणों से पूरी तरह मुक्त होकर सम्यक बुद्ध हो गया हूं।’
उपक को लगा कि बुद्ध अहंकारवश ऐसा दावा कर रहे हैं। कुछ ही दिनों में उसका मन भटकने लगा। एक शिकारी की युवा पुत्री पर मुग्ध होकर उसने उससे विवाह कर लिया। फिर उसे लगने लगा कि अपने माता-पिता व परिवार का त्यागकर उनसे एक प्रकार का विश्वासघात किया है। वह फिर बुद्ध के पास पहुंचा। संशय ने पूर्ण विश्वास व श्रद्धा का स्थान ले लिया। वह बुद्ध की सेवा-सत्संग करके स्वयं भी मुक्ति पथ का पथिक बन गया।
मंगलवार, अक्टूबर 26, 2010
प्रकृति की सबसे खूबसूरत रचना -चांद
करवा चौथ पर कोई वैदिक जानकारी अपने मित्रो को देना चाहता था कोशिश करने पर दैनिक भास्कर में पं. रमेश भोजराज द्विवेदी, जोधपुर. राजस्थान का लेख पढ़ा ! लेखक ने बहुत अच्छी जानकारी चंद्रमा पर दी ! अपने मित्रो के लिए पं. रमेश भोजराज द्विवेदी, जोधपुर. राजस्थान का लेख दे रहा हूँ
रिवाज वेदों के अनुसार विराट पुरुष के मन से चंद्रमा की उत्पत्ति हुई है। प्रकृति की सबसे सुंदर कृति चंद्रमा को अत्यधिक चंचल माना गया है, मन भी चंचल है। चंचल यानी तेज़ गति से चलने वाला। ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा सबसे तेज़ चलने वाला ग्रह है, जो लगभग 54 घंटों में राशि परिवर्तन कर देता है। यह भी कहा जाता है कि यदि सूर्य जगत की आत्मा है, तो चंद्रमाप्राण है।
जगत काप्राण है चंद्रमा ज्योतिष के अनुसार व्यक्ति को धनवान बनाने का कारक भी चंद्रमा ही है। कहा जाता है कि भगवान धन्वंतरि के साथ जो अमृत कलश था, उसी से चंद्रमा की उत्पत्ति हुई है। अमृत का काम जीवन को अमर बनाना होता है, शायद इसलिए चंद्रमा को जगत का प्राण माना गया है। चंद्रमा कृष्ण पक्ष में रोज घटता है और शुक्ल पक्ष में बढ़ता है। यह जल तत्व का कारक ग्रह है इसलिए जल तत्व को प्रभावित करता है और इसकी कलाओं के कारण ही समुद्र में ज्वार आता है। हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिशत जल है। अत: यह हमारे जीवन पर भी बहुत प्रभाव डालता है।
सुंदरतम् है चंद्रमा कहते हैं चंद्रमा राजा है। 27 नक्षत्र इसकी रानियां हैं। लक्ष्मी सहोदरी (बहन) है। इनके पुत्र का नाम बुध है, जो तारा से उत्पन्न हुए हैं। चंद्रमा को सृष्टि में सबसे सुंदर माना गया है। साथ ही यह भावुकता प्रधान और सौंदर्य का उपासक है। चंद्रमा को सोलह कलाओं से युक्त कहा जाता है। प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक तथा अमावस्या के सहित चंद्रमा की कुल सोलह कलाएं बनती हैं।
शरद पूर्णिमा का चंद्रमा आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसके अलावा इसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। पूरे साल में आश्विन मास की पूर्णिमा का चंद्रमा ही सोलह कलाओं का होता है। कहते हैं कि इस रात चंद्रमा अमृत की वर्षा करता है। पूर्णिमा को चंद्रमा पूर्णबली होता है और शरद कालीन चंद्रमा सबसे सुंदर होता है।
सुंदरतम् है चंद्रमा कहते हैं चंद्रमा राजा है। 27 नक्षत्र इसकी रानियां हैं। लक्ष्मी सहोदरी (बहन) है। इनके पुत्र का नाम बुध है, जो तारा से उत्पन्न हुए हैं। चंद्रमा को सृष्टि में सबसे सुंदर माना गया है। साथ ही यह भावुकता प्रधान और सौंदर्य का उपासक है। चंद्रमा को सोलह कलाओं से युक्त कहा जाता है। प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक तथा अमावस्या के सहित चंद्रमा की कुल सोलह कलाएं बनती हैं।
शरद पूर्णिमा का चंद्रमा आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसके अलावा इसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। पूरे साल में आश्विन मास की पूर्णिमा का चंद्रमा ही सोलह कलाओं का होता है। कहते हैं कि इस रात चंद्रमा अमृत की वर्षा करता है। पूर्णिमा को चंद्रमा पूर्णबली होता है और शरद कालीन चंद्रमा सबसे सुंदर होता है।
शरद पूर्णिमा-व्रत विधान इस दिन लक्ष्मी जी को संतुष्ट करने वाला कोजागर व्रत किया जाता है। विवाह के बाद शरद पूर्णिमा से ही पूर्णमा के व्रत को आरम्भ करने का विधान है। कार्तिक का व्रत भी इसी दिन से ही शुरू किया जाता है। इसी दिन भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ है। कहते हैं कि पूर्णमासी के दिन जन्म लेने वाला जातक चंद्रमा की तरह ही सुंदर होता है और चंद्रमा की पूर्ण रश्मियां व सोलह कलाओं के पूर्ण गुण भी जातक को मिलते हैं। इस दिन स्नान करके विधिपूर्वक उपवास रखना चाहिए। तांबे या मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढंकी हुई मां लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करके उनकी पूजा करें। कथा सुनते समय हाथ में गेहूं के दाने रखें। साथ ही एक लोटे में जल, कटोरी में रोली व चावल रखें। कथा समाप्त होने पर हाथ के गेहूं को चिड़ियों को डाल दें और लोटे के जल से रात्रि को अघ्र्य दें। शाम को चंद्रोदय होने पर सोने, चांदी या मिट्टी के घी से भरे हुए 11 दीपक जलाएं। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार कर चंद्रमा की चांदनी में रख दें। एक प्रहर बीतने के बाद इस खीर को देवी लक्ष्मी को अर्पित करें। ब्राह्मण को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएं और मांगलिक गीत गाकर रात्रि जागरण करें। अगली सुबह स्नान कर लक्ष्मीजी की वह प्रतिमा ब्राह्मण को अर्पित करें। माना जाता है कि पूजा से प्रसन्न होकर लक्ष्मीजी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं, साथ ही परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।
रास पूर्णिमा का महत्व नि:संदेह शरद पूर्णिमा का चंद्रमा, चांदनी रात, शीतल पवन और अमृत वर्षा करता आकाश, जिस दिव्य वातावरण की सर्जना करता है, वह अद्वितीय है। यहीं से शरद ऋतु भी प्रारंभ होती हैं। आयुर्वेद में इस रात्रि का विशेष महत्व माना गया है। कहते हैं शरद पूर्णिमा की रात्रि को श्वास रोग की औषधियां रोगी को देने से उसे जल्द ही लाभ मिलता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि चांद की रोशनी में सुई पिरोने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। आज ही के दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचा था। यह भी माना जाता है कि वर्ष में केवल शरद पूर्णिमा की रात को ही खिलने वाले ब्रम्हकमल पुष्प देवी लक्ष्मी को चढ़ाने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
रास पूर्णिमा का महत्व नि:संदेह शरद पूर्णिमा का चंद्रमा, चांदनी रात, शीतल पवन और अमृत वर्षा करता आकाश, जिस दिव्य वातावरण की सर्जना करता है, वह अद्वितीय है। यहीं से शरद ऋतु भी प्रारंभ होती हैं। आयुर्वेद में इस रात्रि का विशेष महत्व माना गया है। कहते हैं शरद पूर्णिमा की रात्रि को श्वास रोग की औषधियां रोगी को देने से उसे जल्द ही लाभ मिलता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि चांद की रोशनी में सुई पिरोने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। आज ही के दिन श्रीकृष्ण ने महारास रचा था। यह भी माना जाता है कि वर्ष में केवल शरद पूर्णिमा की रात को ही खिलने वाले ब्रम्हकमल पुष्प देवी लक्ष्मी को चढ़ाने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
शनिवार, अक्टूबर 02, 2010
महात्मा गांधी की जयंति

आज 2 अक्तूबर है और आज गांधी जी की जयंति है।
महात्मा गांधी को उनकी जयंति पर श्रधांजलि।
"Truth alone will endure, all the rest will be swept away before the tide of time. I must continue to bear testimony to truth even if I am forsaken by all. Mine may today be a voice in the wilderness, but it will be heard when all other voices are silenced, if it is the voice of Truth."- Mahatama Gandhi
2 October 1869 – 30 January 1948)
सोमवार, सितंबर 27, 2010
शुक्रवार, सितंबर 10, 2010
हिमाचल मित्र का वर्षा अंक
हिमाचल मित्र का वर्षा अंक मिला! जे पी सिघंल का आवरण बरबस मुखपृष्ठ को निहारने पर मज़बूर कर देता है! हिमाचल मित्र में प्रकाशित सामग्री पठनीय और संग्रहणीय होती है इसमें कोई दो राय नहीं है! कल्पना की उडान प्रभावित करती है साथ ही कोकस जी का लेख वसुदेव कुटम्बकम की याद दिला देता है! कैलाश आहलुवालिया जी संजोली शिमला महाविद्यालय में मेरे प्राध्यापक रहे है! उन्होने सदैव ही प्रोत्साहित किया है! अंक में प्रकाशित सभी को कहीं ना कहीं पढता रहा हूं! इसी दौरान एस आर हरनोट जी से लम्बे समय के बाद फ़ेस बुक पर सम्पर्क हो पाया यह हिमाचल मित्र का ही सहयोग है! हिमाचल मित्र ने कुछ करने के लिये प्रोत्साहित किया है अन्यथा मैं तो पिछले कई वर्षों से एकांत प्रिय हो गया था! मित्रों की रचनायें पढी तो उनके साथ की यादें ताज़ा हो आई! खैर..... हिमाचल मित्र को साधुवाद! और हां, अनुप जी मे्रा अंक देरी से मिलता है क्या कारण होगा? ज़रा मेरा ध्यान रखें! अगले अंक की प्रतीक्षा में..................... !
बुधवार, सितंबर 08, 2010
विश्वास तुम्हारा
शहर मे जब हो
अराजकता
सुरक्षित ना हो आबरू
स्वतंत्र ना हो सासें
मोड़ पर खड़ी हो मौत
तो मैं कैसे करू विश्वास तुम्हारा,
बाहर से दिखते हो सुन्दर
रचते हो भीतर भीतर ही षड़यंत्र
ढूंढते रहते हो अवसर
किसी के कत्ल का
तो मैं कैसे विश्वास कंरू तुम्हारा,
तुम्हारा विश्वास नहीं कर सकता मैं
सांसों में तुम्हारी बसता है कोई और
तुम बादे करते हो किसी और से
दावा
करते हो तुम विश्वास का
परन्तु तुम में भरा है अविश्वास,
माना विक्षिप्त हूं मैं
कंरू मैं कैसे विश्वास तुम्हारा
तुम और तुम्हारा शहर
नहीं है मेरे विश्वास का पात्र।
शनिवार, अगस्त 14, 2010
मंगलवार, अगस्त 03, 2010
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