शुक्रवार, जुलाई 25, 2025
बघेरा मर गया
रविवार, दिसंबर 10, 2023
जीवन के उच्च मूल्यों को दर्शाती 'खाली भरे हाथ'
रविवार, दिसंबर 10, 2023
*
रौशन जसवाल विक्षिप्त
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अनुवाद,
आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र,
राम लाल वर्मा राही,
समीक्षा
समीक्षा खाली भरे हाथ। मूल लेखक : आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र I
अनुवाद राम
लाल वर्मा राही I
समीक्षक : रौशन जसवाल
शुष्कवृक्षाश्च
मुर्खाश्च न नमन्ति कदाचन ।।
रुकावट बोध
कथा भी जीवन यात्रा को सम्बोधित करती है । इस कथा में जीवन में करुणा, दया के एक दूसरे की मदद करने को विषय बना सारगर्भित सन्देश दिया गया कर।
इस विषय को ठींड और जवाणस बोधकथा में भी लिया गया जो वास्तव में प्रेरक और
प्रभावशाली है स्त्री पुरुषों जीवन सम्बंधों पर खाली भरे हाथ पुस्तक में जवाणसो री
तमन्ना, जवाणसा रा जीऊ, जवाणसा री
चुनरी, एस्स जमाने री प्रेमिका, जवाणसो
रा प्यार, बोध कथाएं है। ये बोध सम्बंधों में ईमानदारी समाज,
परिवार और प्रत्येक कार्य के प्रति स्नेह, आत्मीय
सम्बंधों और कार्यशील रहने का सन्देश देती है। माछो री माटी, माछो रा आपणा, माछो री कमजोरी, ठींडो री मजबूरी कुछ ऐसी बोध कथाएं है जो मनुष्य मात्र को कर्तव्य बोध का
अहसास के पात्र है। हमारे खान पान में मांसाहार और शाकाहार में से श्रेष्ठ आधार को
व्यक्त करती बोध कथाएं मांसाहारी रा कारण और 'शाखाहारी रा
जोर प्रेरक बोध बोधकथाए है तो आहार के चयन
उपयोगिता पर प्रकाश डालती है। पापी सरीर बोध कथा में दशहरा के माध्यम बुराई के
समूल नाश औ स्वस्थ जीवन यापन पर जोर दिया। गया है।
शर्मी रा पर्दा बोध कथा में प्रातःकाल और रात के वार्तालाप के माध्यम से सुबह जल्दी जागने के महत्त्व को दर्शाया गया जो वास्तव में तार्कित और युक्ति संगत है। कामणा बोधकथा में भी दीपक के दूसरे को प्रकाश देने के माध्यम से जीवन में लोक कल्याण और जन सेवा में लगाने का सन्देश दिया गया है।
पुस्तक की विशेषता है कि कठिन पहाड़ी शब्दों के पाद टिप्पणी में
अर्थ दिए गए है जो पाठकों को
कठिन पहाड़ी शब्दों को समझने में सहायता करते है।
पहाड़ी में अनुवाद बेहद कम हो रहा है लेकिन राम लाल वर्मा राही का ये प्रयास
श्लाघनीय है। पुस्तक पठनीय, संग्रहणीय तो है ही साथ ही
बच्चों के चरित्र निर्माण और दृष्टिकोण विकास में सहायक है।
शनिवार, नवंबर 04, 2023
रेडियो भूली बिसरी स्मृतियां
शनिवार, नवंबर 04, 2023
*
रौशन जसवाल विक्षिप्त
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अधुरेे पन्ने,
आकाशवाणी,
इतिहास,
AIR SHIMLA
ये आकाशवाणी है..........।
रेडियो पर ये उद्घोषणा सुनते ही एक अजब
अनुभूति का आभास होता है। जैसे आकाश से वाणी सुनाई दे रही हो। आकाशवाणी से ये शब्द सुनते ही रोमान्च हो उठता है अनेक जिज्ञासाएं कौंध जाती है। छोटे से उपकरण रेडियों के माध्यम संवाद, समाचार संगीत और भी बहुत कुछ का प्रसारण हमेशा ही उद्वेलित करता रहा है। कैसे होते है वे लोग जो आवाज के माध्यम से हमारे दिलों में कहीं गहरे उतर जाते है और हृदय में जगह बना लेते हैं।रेडियो प्रतिदिन विशेष कर प्रातःकाल और शाम को अवश्य सुना जाता । सुबह सुबह धार्मिक भजनों के लिए तो शाम समाचारों के लिए । याद आता है कि मेरे बाल्य काल मे प्रादेशिक समाचारों में राम कुमार काले की
प्रमुख आवाज थी। उनकी बुलन्द आवाज और उच्चारण आज भी श्रोता याद करते है। उनको सुनते तो जिज्ञासा होती कि काले साहब कैसे होंगे । ज़रूर रोबिला और लम्बी हटीकट्टी कद काठी के रहे होंगे। बहुत बाद में जब मेरा आकाशवाणी आना जाना हुआ तो पता चला कि वे बेहद सहृदय और साधारण कदकाठी के थे। मां बताती थी कि अपने बाल्यकाल में अकसर मैं उनकी नकल कर समाचार पढ़ने का प्रयास किया करता था ।स्थान परिवर्तन
हुआ। 1977 में ठियोग से ढली शिमला आ गए और तो दसवीं कक्षा के लिए मशोबरा गए। उस
समय एक कार्यक्रम आता था विद्यार्थियों के लिए। आकाशवाणी की टीम स्कूलों में जाकर
रिकार्डिंग किया करती थी। ये 1979-80 की बात है हमारे स्कूल
में भी आकाशवाणी की टीम रिकॉर्डिंग के लिए आई थी। कई बच्चों की स्वर परीक्षा प्रस्तुति
कम्पेयरर ली गई परन्तु टीम की प्रभारी
नलिनी कपूर को कोई आवाज पसंद ही नहीं आई। विद्यालय के एनडीएसआई सर जोगेन्द्र धोलटा ने मेरा नाम सुझाया तो कम्पेयरर के रूप
में मेरा चयन हो गया और मेरे साथ चयनित हुई रीता श्रीवास्तव नाम की सहपाठी ।
सम्भवतः शनिवार साढ़े 12 बजे ये कार्यक्रम प्रसारित हुआ। विद्यालय में ही रेडियो का प्रबंध हुआ। पहली बार
आकाशवाणी के माध्यम से अपनी आवाज़ को सुना । सच मानिए बेहद रौमांच और गौरव के क्षण
थे मेरे लिए। दसवीं के बाद संजौली कालेज से बीए किया और फिर विश्वाविद्यालय पहुंच
गए। इस मध्य युववाणी कार्यक्रम के प्रस्तुत करने का अवसर मिला। युववाणी के बाद उद्घोषक
के लिए चयन हुआ तो प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित हुआ। दीपक भण्डारी, बी.आर.
मैहता, अच्छर सिंह परमार, शान्ता वालिया
उस समय उदघोषणाओं में प्रमुख नाम थे। प्रशिक्षण के दौरान इन सभी से प्रत्यक्ष मुलाकात
हो पाई। मैं दीपक भण्डारी से अधिक प्रभावित रहा। प्रशिक्षण के बाद हमारी उदघोषणाओं
के लिए डयूटी लगनी आरम्भ हो गई। प्राय: शनिवार की रात और रविवार की सुबह की सभा
में ड्यूटी लगती।
अच्छर सिंह परमार उदघोषक होने के साथ साथ संगीत प्रेमी और गायन भी थे। उनका नए कलाकारों से हमेशा ही सौहार्द पूर्ण सम्बध रहे है नए कलाकार परमार से प्रसारण की बारिकीयां सीखते रहे है। परमार जी गायन में विशेष रुचि रखते थे। उनकी गायन जोड़ी ज्वाला प्रसाद शर्मा के साथ प्रसिद्ध थी। उनका गाया गीत पैहर सबैला री नी गई री बहुए अड़ीए दिन चड़ने जो आया प्रसिद्ध है जो आज भी भी बहुत शौक से सुना और गाया जाता है। अच्छर सिंह परमार मन्डयाली कार्यक्रम में भी बेहद रुचि रखते थे।
बी.आर.मैहता
की भारी और दमदार आवाज़ श्रोताओं को बेहद
प्रभावित करती थी। श्रोता उनसे आकर्षित रहा करते थे। नाटकों में भी विशेष रूचि
रहती थी । बी. आर.मेहता हमेशा ही आवाज़ के
मोडूलेशन पर ज्यादा जोर देते थे। उनका मानना था कि इस माध्यम से श्रोताओं से
असरदार संवाद स्थापित हो पाता है। उस समय नियमित
उदघोषकों के अलावा शैल पंडित, दीपक शर्मा, जवाहर कौल, नरेंद्र कंवर केजुअल
उदघोषक हुआ करते थे। वर्तमान में डॉ.
हुकुम शर्मा और सपना ठाकुार नियमित उदघोषक के रूप में कार्यरत है जो श्रोताओं को
अपनी प्रस्तुतियों से प्रभावित कर रहे हैं।
आकाशवाणी पारिश्रमिक
भी देती थी। सांयकालीन ड्यूटी के दौरान
कार्यक्रम गीत पहाड़ा रे प्रस्तुत करने में मुझे आनन्द आता था। फरमाईशी कार्यक्रम
था तो श्रोताओं की फरमाइश पर पहाड़ी गीत प्रसारित किए जाते । अपने मित्रों के नाम
भी इसमें अक्सर ले लिया करता था। कुछ समय बाद दोपहर की सभा संचालित करने लगा।
सैनिकों के लिए कार्यक्रम में फिल्मी गीत बजाए जाते। रविवार को सैनिकों के लिए
फरमाईशी कार्यक्रम होता था। इस कार्यक्रम को प्रसारित करने में मुझे आनन्द की अनुभूति
होती।
आकाशवाणी
शिमला के प्रादेशिक समाचार सबसे ज्यादा सुना जाने वाला कार्यक्रम है। समाचार एकांश में जी.सी.पठानिया, बी.के.ठुकराल सम्पादन कक्ष में कार्यरत थे जबकि हंसा गौतम निममित समाचार वाचक थी। कुछ समय बाद
शान्ता वालिया ने भी नियमित समाचार वाचन में नियुक्ति पाई थी।
1990-1991 के आसपास केजुअल
प्रादेशिक समाचार वाचक के रूप में मेरा चयन हो गया । प्रशिक्षण कार्यक्रम
राष्ट्रीय समाचार वाचक कृष्ण कुमार भार्गव के सानिध्य में पूरा किया। उस समय
समाचार एकांश में हंसा गौतम और शांता वालिया प्रमुख आवाज़ थी। हँसा गौतम आकर्षक
व्यक्तित्व और शानदार आवाज की मालिक थी। उनका वाचन हमेशा दोष रहित रहता था। वे नए
केजुअल समाचार वाचकों को उच्चारण पर ध्यान देने के लिए सदैव प्रेरित करती थी। हंसा गौतम का मृदु भाषी होना सभी को बेहद
प्रभावित करता
था। शांता वालिया आकर्षक
कदकाठी की थी और उनको हमेशा साड़ी में ही देखा । उनका रोबिले अंदाज में चलना उनके
व्यक्तिव को शानदार बनाता था। वे नए कलाकारों को हमेशा ही प्रोत्साहित करती थी ।
केजुअल समाचार वाचकों में दीपक शर्मा जवाहर कौल अनुराग पराशर
आकाशवाणी शिमला को जब जब याद करता हूँ तो बहुत सी आवाजें और वरिष्ठ सहयोगी याद आते है जिन्होने श्रोताओं के मानस पटल पर अपनी आवाज के दम पर अपना नाम बनाया ।
कति राम के एल सहगल त्रिलोक सिंह
ज्वाला प्रसाद याद आते है जो श्रोताओं के हृदय में आज भी उपस्थित है। कला ठाकुर लता वर्मा हीरा नेगी,
कृष्ण सिंह ठाकुर, रोशनी देवी. कुछ ऐसे नाम है
जो संगीत,प्रसारण, प्रोग्राम
प्रोडक्शन आदि अनेक कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल हो पाए थे ।आपका पत्र
मिला,
कृषि जगत, बाल गोपाल, वनिता
मण्डल, शिखरों के आसपास, अमरवाणी,
सैलानियों के लिए, धारा रे गीत, और बोलियों के कार्यक्रम ज्यादा सुने जाने वाले कार्यक्रमों में रहे है। कला
ठाकुर और हीरा नेगी ने विभिन्न कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभार्इ। कला
ठाकुर जानकी के नाम से कार्यक्रम प्रस्तुत करती थी उनके फैन उनसे मिलने आते तो
जानकी को ही पूछा करते थे। अनेक ऐसे कलाकार है जो अपनी योग्यता के कारण हमेशा स्मृति
पटल पर अंकित है।
आकाशवाणी शिमला को जब भी याद करता हूँ तो ड्यूटी रूम, लेखा संकाय, कंटीन और गेस्ट रूम याद आते । गेस्ट रूम में उदघोषणाओं की क्रास डयूटी के दौरान सोया
हूं । ड्यूटी रूम में ज्ञान जी, अभय जी और निराला जी याद आते है। अभय जी पढ़ाई में बेहद मेहनती थे। मित्रवत स्वभाव के अभय अक्सर केजुअल को पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की जानकारी देते और प्रेरित करते। प्राय उन्हे प्रतियोगी पुस्तकों के साथ देखता था । बाद में उनका चयन प्रशासनिक सेवाओं में हो गया था। लेखा संकाय से चैक मिला करते थे जो अब भी मुझे उद्वेलित करते हैं। लेखा संकाय में सुशील जी स्मरण हो आते हैं। खैर ..…... ।मुझे मालूम है कि कुछ नाम अवश्य ही छूट गए होंगे। पाठक इसे अन्यथा नहीं लेंगे और इसकी जानकारी मुझे दे कर प्रोत्साहित करेंगे ।एफएम के
आने से प्रायमरी प्रसारण का सुना जाना जरूर कम हुआ है लेकिन प्रायमरी चैनल के
प्रसारणों में लोग आज भी रूचि रखते है।
मैं आज भी
गांव की ऊंची पहाड़ी पर से रेडियो पर बज रहा पहाड़ी गीतों के कार्यक्रम में गीत सुनता हूं, तेरी परांउठी लागा रेडिया ...... और मैं सदा ही आश्वसत हूं कि रेडियों जनमानस
की आवाज़ रहेगा और एक आकर्षण भी ।
* रौशन जसवाल
विक्षिप्त
शनिवार, अक्टूबर 21, 2023
देवता झूठ नहीं बोलता
देवता झूठ नहीं बोलता
- ------ ----- ---- --- बात निकलेगी तो दूर तलक जाऐगी। अब शीर्षक ही लीक से हट कर हो तो चर्चा होना
गुरुवार, अक्टूबर 12, 2023
मजमा
सुना है शहर में फिर मज़मा लगने वाला है। हर साल की तरह सुदूर देश से आयेंगे व्यापारी देंगे प्रलोभन और ठगेगे पहाड़ को। पहाड़ रोज ठगा जाता है और खामोश रहता है।
वो जो बड़ा चौगांन है शहर के बीच वहाँ भी सजती है व्यजनों की अनेक दुकाने। पहाड़ ने देखा था मज़मा के दौरान वहाँ गंदगी का ढेर और परोसते दूषित व्यजन और बीमार होता पहाड़।
बच्चे तो बाल हठ करेंगे ही और खा लेंगे उन्ही पंडालों से अनाप शनाप।
पहाड़ को सब सहना होगा चुपचाप और शहर मस्त हो देखेगा मज़मा.......
वक्त
ये वक्त है
गुजर ही जायेगा
अभी बुरा है
तो
अच्छा भी आयेगा,
वक्त है
गुजरना जिसकी फितरत है
गुजर ही जायेगा।
बुधवार, अक्टूबर 04, 2023
सच्ची दूकान
हर रोज़ ही
उस दूकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी। भीड़ हो भी क्यों न?
जो सामान कहीं अन्य दूकान पर ना मिले तो उस दूकान पर सस्ता और हमेशा
उपलब्ध हो जाता था। यही कारण था कि उस दूकान पर हमेशा भीड़ उमड़ी रहती थी। दूकान का
नाम भी आकर्षित करता था सच्ची दूकान ।
हर वर्ष उस
दूकान का मालिक सभी के लिए भंडारे का आयोजन भी करता और खूब दान आदि भी देता। लोग
कहते थे कि ईश्वर की उस पर विशेष कृपा है।
कृपा के
साथ साथ उसकी समृद्धि की चर्चा अक्सर लोग करते रहते थे। गाहे बगाहे ये चर्चाएं मुझ
तक भी पहुंचती रहती थी। इतनी चर्चा और प्रसिद्धि के बावज़ूद कभी उस दूकान से सामान
लेने का अवसर नहीं मिला।
रविवार का
दिन वैसे तो आराम का दिन होता है। रसोई का कुछ सामान समाप्त हो गया था। सूची लम्बी
बन गई थी। सोचा उसी दूकान का लाभ उठाया जाए। परिचय भी हो जायेगा।
सामान की
सूची दूकानदार को दी। सामान पैक हुआ और वापस हो लिया। घर आ कर सामान खोलने लगा तो
एक पैकेट पर बेस्ट बिफोर डेट पर पढ़ी। डेट
खत्म हो चुकी थी। पूरा सामान चेक किया तो तीन सामान की डेट एकस्पायरी निकली। ऐसी
षिकायत अन्य ग्राहकों से भी सुनने को मिली थी। लोग तो कहते थे कि पूरा साल
एकस्पायरी बेचते रहो और साल में भण्डारा और दान दिया करो। पाप कट जाते है। उस
दूकान के सस्ते सामान और ईश्वर कृपा का गणित धीरे धीरे मेरी समझ में आ रहा था।
शुक्रवार, जून 02, 2023
सोलन का शूलिनी मेला
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हिमाचल
को प्राचीन काल से ही देव भूमि के नाम से संबोधित किया गया है। यदि हम ये कहें कि
हिमाचल देवी देवताओं का निवास स्थान रहा है । हमारे कई धर्म ग्रन्थों में भी हमे
हिमाचल का विवरण मिलता है। महाभारत
,पदमपुराण और कनिंघम जैसे धर्म
ग्रन्थों में हमे हिमाचल का विवरण मिलता है। इस सब से हम ये अनुमान लगा सकते है कि
हिमाचल प्राचीन काल से ही देवी देवताओं का प्रिय स्थान रहा है ।
हिमाचल प्रदेश के 12 जिलों में सोलन एक
महत्वपूर्ण जिला है। सोलन जिला मुख्यालय है । सोलन राज्य की राजधानी शिमला से लगभग 47 किलोमीटर और 5,090 फीट की औसत ऊंचाई
पर स्थित है। कालका-शिमला राष्ट्रीय
राजमार्ग-22 पर स्थित
है । नैरो-गेज कालका-शिमला रेलवे सोलन से होकर गुजरती है। पंजाब हिमाचल सीमा पर स्थित, सोलन हिमालय की
शिवालिक पहाड़ियों में बसा है ।
सोलन का नाम देवी शूलिनी देवी के नाम पर रखा गया है । हर साल
जून में 3 दिवसीय शूलिनी मेला आयोजित किया जाता है। सोलन तत्कालीन रियासत बघाट की राजधानी थी ।
सोलन को मशरूम शहर रूप में जाना जाता है क्योंकि मशरूम की खेती के साथ-साथ चंबाघाट में मशरूम
अनुसंधान निदेशालय भी है। टमाटर के थोक उत्पादन के कारण सोलन को लाल सोने का शहर
भी कहा जाता है। ।
सोलन में कई प्राचीन मंदिर हैं। देश की सबसे पुरानी ब्रुअरीज मोहन मैकिन भी सोलन में है। धारों की धार पहाड़ी पर 300 साल पुराना किला भी है। शूलिनी माता मंदिर और जटोली शिव मंदिर पर्यटकों के लिए लोकप्रिय स्थान हैं। कालाघाट ओच्छघाट में तिब्बती मठ इस क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध मठों में से एक है।
मां शूलिनी मेला लगभग 200 साल से मनाया जा रहा है। इस मेले का इतिहास बघाट रियासत से जुड़ा हैं। यह मेला हर साल जून माह में मनाया जाता है। इस दौरान मां शूलिनी शहर के
भ्रमण पर निकलती हैं व वापसी में अपनी बहन के पास दो दिन के लिए ठहरती हैं। इसके
बाद अपने मंदिर स्थान पर वापस पहुंचती हैं, इसलिए इस
मेले का आयोजन किया जाता है। माना जाता है कि माता शूलिनी सात बहनों में से एक थी।
अन्य बहनें हिंगलाज देवी, जेठी ज्वाला जी, लुगासना देवी, नैना देवी और तारा देवी के नाम
से विख्यात हैं। सोलन नगर बघाट रियासत की राजधानी हुआ करती थी। इस रियासत की नींव
राजा बिजली देव ने रखी थी। बारह घाटों से मिलकर बनने वाली बघाट रियासत का
क्षेत्रफल लगभग 30 वर्ग मील में फैला हुआ था। इस
रियासत की प्रारंभ में राजधानी जौणाजी कुछ समय कोटी और बाद में सोलन बनी। राजा
दुर्गा सिंह इस रियासत के अंतिम शासक थे।
माँ शूलिनी देवी दुर्गा या पार्वती का प्रमुख रूप
है। उन्हें देवी और शक्ति, शूलिनी
दुर्गा, शिवानी और सलोनी के नाम से भी जाना जाता है।
माँ शूलिनी भगवान शिव की शक्ति हैं।
भगवान विष्णु के चौथे अवतार नरसिंह, उपद्रवी असुर राजा
हिरण्यकश्यप को मारने के बाद अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सके। नरसिंह पूरे
ब्रह्मांड के लिए खतरा बन रहे थे तब भगवान शिव, नरसिंह
को शांत करने के लिए शरभ के रूप में प्रकट हुए। शरभ एक आठ पैरों वाला जानवर था, जो शेर या हाथी से अधिक शक्तिशाली था और सिंह को शांत करने में सक्षम भी
था। नरसिंह को शांत करने के लिए भगवान शिव
के आशीर्वाद से शूलिनी भी प्रकट हुई थीं। माँ शूलिनी सोलन के लोगों की कुल देवी
हैं। प्रदेश में मनाए जाने
वाले पारंपरिक एवं प्रसिद्ध मेलों में माता शूलिनी मेला का भी प्रमुख स्थान है।
बदलते परिवेश के बावजूद यह मेला अपनी प्राचीन परंपरा को संजोए हुए है।
मान्यता है कि माता शूलिनी के प्रसन्न होने पर
क्षेत्र में किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा या महामारी का प्रकोप नहीं होता है, बल्कि
सुख-समृद्धि व खुशहाली आती है। मेले की यह परंपरा आज भी कायम है। कालांतर में यह
मेला केवल एक दिन ही अर्थात् आषाढ़ मास के दूसरे रविवार को शूलिनी माता के मंदिर
के समीप खेतों में मनाया जाता था। सोलन जिला के अस्तित्व में आने के पश्चात् इसका
सांस्कृतिक महत्व बनाए रखने तथा इसे और आकर्षक बनाने के अलावा पर्यटन की दृष्टि से
बढ़ावा देने के लिए राज्य स्तरीय मेले का दर्जा प्रदान किया गया और तीन दिवसीय
उत्सव का दर्जा प्रदान किया गया है। वर्तमान समय में यह मेला जहां जनमानस की
भावनाओं से जुड़ा है, वहीं
पर विशेषकर ग्रामीण लोगों को मेले में आपसी मिलने-जुलने का अवसर मिलता है जिससे
लोगों में आपसी भाईचारा तथा राष्ट्र की एकता व अखंडता की भावना पैदा होती है।
बुधवार, मई 17, 2023
अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस
संग्रहालय जगह होती है, जहां पर संस्कृति, परंपरा और ऐतिहासिक महत्व रखने वाली अतीत की स्मृतियों के अवशेषों और कलाकृतियों को सुरक्षित रखा जाता है, ताकि आने वाली पीढ़ी को पुरानी संस्कृति से जोड़ा जा सके. इसके लिए भारत समेत दुनियाभर में तमाम म्यूजियम बनाए गए हैं. इन संग्रहालय की महत्ता को समझाने के लिए हर साल 18 मई को अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस मनाया जाता है
देश का सबसे बड़ा म्यूजियम कोलकाता में है. इस संग्रहालय को
भारतीय संग्रहालय के नाम से जाना जाता है. भारतीय संग्रहालय का पुराना नाम
इंपीरियल म्यूजियम था, बाद में बदलकर इंडियन म्यूजियम कर
दिया गया. जवाहरलाल स्ट्रीट पर स्थित इस म्यूजियम को छह खंडों में बनाया गया है.
इस म्यूजियम की स्थापना अंग्रेजों के समय में
सन 1814 ई.
में की गई थी. भारत की विरासत की रक्षा के लिए इसकी स्थापना एशियाटिक
सोसायटी ऑफ बंगाल ने की थी और इसे नेथेलिन वैलीच की देख-रेख में बनाया गया था.
विलियम जॉन्स ने इस संग्रहालय को बनवाने में अहम योगदान दिया था. इस म्यूजियम के
बाद ही भारत में तमाम संग्रहालय बनने शुरू हुए.
इस संग्रहालय को छह खंडों आर्कियोलॉजी, एंथ्रोपोलॉजी, जियोलॉजी, जूलॉजी, इंडस्ट्री
और आर्ट में बनाया गया है. एंथ्रोपोलॉजी सेक्शन में आप मोहनजोदड़ो और हड़प्पा काल
की निशानियां देख सकते हैं. यहां चार हजार साल पुरानी मिस्र की ममी भी रखी है.
हिमाचल का राज्य संग्रहालय शिमला
में एक पुरानी विक्टोरियन हेवली में बनाया गया है। यह हवेली कभी लॉर्ड विलियम
बेरेस्फोर्ड का निवास स्थान हुआ करती थी, जो वायसराय लॉर्ड
विलियम बेनटिक के सैन्य सचिव थे। ब्रिटिश साम्राज्य के चले जाने के बाद यह इमारत
भारत के सरकारी अधिकारियों के निवास स्थान के रूप में इस्तेमाल की जाने लगी। 26
जनवरी 1974 को इस इमारत में शिमला स्टेट
म्यूजिम का उद्घाटन हुआ।
अंतर्राष्ट्रीय
संग्रहालय दिवस की स्थापना 1977 में मॉस्को, रूस
में ICOM महासभा के दौरान की गई थी। अंतरराष्ट्रीय म्यूजियम
दिवस18 मई को सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच आपसी
समझ, सहयोग और शांति के विकास के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप
में मनाने के लिए किया गया।
विवरण सभार
शनिवार, मई 13, 2023
शुक्रवार, मई 12, 2023
अम्मा
अम्मा
बुनती
है रंग बिरंगी गेंदें ,
वो
जानती है
पहाड़
की तलहटी में
सर्दियों
के मौसम में
खेल
होगा
और
जुटेंगे
अनगिनत लोग,
अम्मा
ने देखा नहीं है
सर्दियों
के मौसम का ये खेल
उसकी
आँखों ने देखे है
अपनों
के साथ
अपनों
का ही खेल,
वो
बुनती है गेंदें चुपचाप
गेंदें
रंग बिरंगी
तलहटी
में उस खेल के लिए ।
गुरुवार, मई 11, 2023
कान
दिवारों
के कान होते हैं।
हमेशा
सुना है।
लेकिन
ये कान बहरे होते हैं।
ये सच
और सही सुन नहीं पाते
यही
बहरे कान अक्सर अफवाह फैलाते है
रविवार, मार्च 19, 2023
शिमला मैं तुम्हे याद करता हूँ।
शिमला
मैं तुम्हे याद करता हूँ। बचपन यही तो बिता है। मटरगश्ती भी तो यही की है। ढली उस समय मिडल स्कूल होता था। मशोबरा से दसवीं पास करने के बाद संजौली कॉलेज में दाखिला लिया तो मानो आसमान मिल गया। कक्षाएं लगाने के बाद रिज पर जाना लोगो को देखना गप्पे लगाना हमेशा याद आता है। संजौली में कलकत्ता टी स्टॉल के परांठे हमेशा याद आते है। हाँ खाली समय मे सेंट बीड्स की तरफ चक्कर लगाना भी याद है।
स्नातक
होने के बाद विश्वविद्यालय में प्रवेश ने नए आयाम दिए। कभी कभी ढली से समरहिल तक
पैदल पहुंचना याद है। रिज पर लवीना में सॉफ्टी का आनंद मैं कभी नहीं भूल सकता और
रिज पर पर बढ़े पेड़ के नीचे बैठे भाई से मूंगफली खाना मेरी स्मृतियों में है।
कभी
सोचता था यहीं जीवन बीत जाएगा। गोष्ठियां होंगी कविताएं सुनाऊंगा कविताएं सुनूंगा।
ईश्वर आपके
लिए क्या सोचता है कोई नहीं जानता।
ये फोर
लेन कहां से आ गया विस्तफीत कर दिया ऐसा कभी सोचा नहीं था। फोरलेन तुम्हे मैं कभी
माफ नहीं करूंगा । तुमने मेरे आत्मीयों को मुझ से छीना है और मुझे अकेला किया है।
मैं ये
किस शहर में आ गया हूँ। यहां तो मैं अकेला हो गया हूँ ।
जब
शिमला तुम मुझे बुलाते हो मैं अपने को रोक नहीं पता हूँ। गेयटी में हिमालयन मंच का
आयोजन हो या कीकली या फिर भाषा विभाग का आयोजन। हिमालयन मंच तो काफी बाद में बना
ये तरुण संगम होता था और ग्रेंड होटल के सभागार में आयोजन होते थे।
इसी
समय कालीबाड़ी के रास्ते में गोलगप्पों का आनंद उठाते थे। वो जो काली बॉडी के पास
गोलगप्पों वाला है उसका ज़ायका अलग था अगली बार समय मिला तो जरूर उससे मिलूंगा। अब
वही है या नहीं मालूम नहीं ।
रेडियो
और दूरदर्शन तक मुझे भूल गए है। उनसे कोई शिकायत नहीं। कुछ लोग समय के साथ बदल
जाते है।
ये सब
न लिखता अगर कीकली ने बच्चों के कार्यक्रम में न बुलाया होता।
मुझे
हिमालयन मंच के आमन्त्रण का इंतज़ार रहता है। ये इसलिए की मेरे लेखन की शुरुआत में
इसका बहुत बड़ा हाथ है। बाकी भाषा विभाग और अकादमी तो मुझे कभी याद करता ही नहीं।
उनकी सूची में मैं हूँ ही नहीं।
कभी
सोचा नहीं था जीवन के अंतिम पड़ाव मैं इस शहर सोलन आ जाऊंगा। लेकिन तुमसे शिकायत है
तुम बहुधा पूर्वाग्रह में आ जाते हो। ये पूर्वाग्रह ये दल बंधी मुझे बिल्कुल पसंद
नहीं। इस बारे कभी किसी दिन और बात करूँगा।
शिमला
मैं कुछ नहीं भुला हूँ क्या तुम्हे कुछ याद है। शिमला मैं तुम्हे बहुत याद करता
हूँ। परंतु तुम तो मुझे भूल गए हो....।
तस्वीर साभार नमन पांडेय


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