शनिवार, मई 15, 2010
अहंकार
सिखों के पांचवें गुरु अर्जुनदेव जी महान विरक्त संत के साथ-साथ एक प्रतिभा संपन्न कवि भी थे। उनके दर्शन व सत्संग के लिए सभी वर्गों के लोग लालायित रहा करते थे। एक बार पंजाब में एक सुशिक्षित व्यक्ति उनके दर्शन के लिए पहुंचा। उसने गुरुजी से प्रश्न किया, ‘साधना के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा क्या है?’ गुरुजी ने बताया, ‘अभिमान साधना मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। गुरुवाणी में कहा गया है- हउमै वड्डा रोग है -पतन का सबसे बड़ा कारण ही अहंकार है। सभी मनुष्यों में वही बड़ा है, जो अपना अहं भाव छोड़कर विनम्र बन जाता है। जो अपने को सबसे छोटा समझता है, वास्तव में वही बड़ा है।’ गुरु अर्जुनदेव जी ने अष्टपदियों की रचना की। सुखमनी साहिब में उनकी चौबीस अष्टपदियां दी गई हैं। इन अष्टपदियों में मानव को तमाम विकार त्यागकर प्रभु के नाम का स्मरण करने की प्रेरणा दी गई है। गुरुजी लिखते हैं, ‘ब्रह्म ज्ञानी वह है, जो ब्रह्म को समझता है। ब्रह्म ज्ञानी निर्भीक होता है। उसका उपदेश सभी को पवित्र कर देता है।’ गुरु अर्जुनदेव जी लिखते हैं, ‘प्रभु की निकटता प्राप्त करने के लिए घर-बार त्यागकर संन्यासी हो जाना जरूरी नहीं है। मनुष्य गृहस्थ रहकर अपने सभी सांसारिक दायित्वों का निर्वाह करता हुआ भी प्रभुनाम का सुमिरन करके निर्वाण प्राप्त कर सकता है। प्रभु पर भरोसा रखने से मृत्यु का भय स्वतः जाता रहता है।’
सच्चा धर्म
प्रतिष्ठित विचारक टॉलस्टॉय ने अपनी यूरोप यात्रा के दौरान देखा कि उनके लिखे साहित्य से बड़े-बड़े बुद्धिजीवी प्रभावित हैं। उनकी प्रतिष्ठता चरम पर पहुंच रही है। अपनी आत्मकथा कन्फेशन में उन्होंने लिखा है, ‘प्रतिष्ठा से पुलकित मेरे मन में यह जिज्ञासा पैदा हुई कि कीर्ति, धन, ऐश्वर्य पाकर क्या मानव का जीवन सार्थक हो जाता है? मैं विचार करता कि क्या ये सभी चीजें मृत्यु को रोक सकती हैं? मनुष्य जन्म क्यों लेता है? किसलिए जीता है? उसके जीवन की सार्थकता क्या है? ये प्रश्न मेरे मन-मस्तिष्क को झकझोरते रहते।’ टॉलस्टॉय ने गीता तथा अन्य धर्मग्रंथों का भी अध्ययन किया था। उन्हें अनुभूति होने लगी कि जीवन की सार्थकता कर्म में है। एक किसान मौसम की चिंता किए बिना प्रत्येक दिन खेत में पहुंचता है और शारीरिक श्रम करता है। यदि मौसम प्रतिकूल होने के कारण फसल मनमाफिक नहीं होती है, तब भी वह अपने परिश्रम पर पछतावा नहीं करता। वह बिना घबराए सभी प्रकार के कष्ट सहने की क्षमता रखता है। टॉलस्टॉय ने कर्म को ही मानव का धर्म माना। वह भारतीय संस्कृति के प्रमुख सूत्रों, सत्य, अहिंसा, करुणा की भावना से बहुत प्रभावित रहे। उन्होंने लिखा, ‘केवल भौतिकवाद, सांसारिक सुख-सुविधाओं से मानव-हृदय को पूर्ण संतुष्टि नहीं मिल सकती। दूसरे की सहायता करने व दुख में सहभागी बनने से ही मानव को सच्ची आत्मिक शांति प्राप्त होती है।’
भक्ति में सुख
कुरु का राजकुमार भगवान श्रीकृष्ण का भक्त था। उसने संकल्प लिया कि अपना समस्त जीवन वह वृंदावन में बिताएगा। वृंदावन पहुंचकर यमुना तट पर उसने कुटिया बनाई और पूजा-उपासना करने लगा। एक बार मगध देश के राजा सपरिवार वृंदावन पहुंचे। जब राजा-रानी यमुना स्नान करने जा रहे थे तब वृक्ष के नीचे उपासना में लीन तेजस्वी साधु को देखकर वे रुक गए। साधु की समाधि पूरी होने के बाद मगधराज ने विनम्रतापूर्वक कहा, तपस्वी, मुझे आपके चेहरे के तेज से आभास होता है कि कहीं आप राजकुमार तो नहीं। साधु ने कहा, भगवान श्रीकृष्ण की पावन लीला-भूमि में न कोई राजकुमार होता है और न राजा। श्रीकृष्ण तो अपने सखा गवालो को भी गले लगाते थे। इसलिए यहां कुल और जाति का विचार करना अधर्म है।’ राजा तपस्वी के वचनों से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने अनुरोध किया, ‘आप हमारे साथ चलें। अभी आप युवक हैं। हम आपका विवाह अपने कुल की कन्या से करा देंगे। गृहस्थ आश्रम के सभी सुख आप भोगेंगे। कभी दुखी नहीं रहेंगे।’ साधु ने पूछा, ‘क्या राजा व धनवान को कभी दुख नहीं सताता? क्या राजा व गृहस्थ के परिवार में किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती? फिर सुख से रहने की बात कहकर आप मुझे साधना से विरक्त क्यों करना चाहते हैं? श्रीकृष्ण की भक्ति में मुझे अनूठा सुख मिलता है।’ राजा ने युवा साधु को गुरु मान लिया और स्वयं भी राजपाट त्यागकर वृंदावन में रहने लगे।
उपदेश
कुरुक्षेत्र में खग्रास सूर्यग्रहण लगा था। ब्रज से वसुदेव जी भी वहां पहुंचे। ऋषि गणों के शिविर में उन्होंने शास्त्र प्रवक्ता व्यास जी से अनेक प्रश्न किए। वसुदेव जी ने जिज्ञासावश पूछा, ‘सद्गृहस्थ के लिए कल्याण के सरल साधन कौन-से हैं?’ महर्षि व्यास ने कहा, ‘न्यायपूर्वक अर्जित धन से पूजन-अर्चन तथा यज्ञ करें, इच्छाएं सीमित रखें, परिवार का पालन-पोषण करें और धर्म व सत्य के मार्ग पर अटल रहें- इन नियमों के पालन से स्वतः कल्याण हो जाता है।’ वसुदेव जी ने पूछा, ‘ऋषिवर, इच्छाएं त्यागने के उपाय क्या हैं?’ व्यास जी ने बताया, ‘धनार्जन करें, परंतु धर्मपूर्वक और न्यायपूर्वक ही। भले ही भूखे रहना पड़े, पर अधर्मपूर्वक धन कदापि अर्जित न करें। वही धन सार्थक होता है, जो यज्ञ, दानादि व परोपकार में व्यय किया जाता है।’ व्यास जी ने आगे कहा, ‘जब मनुष्य को पौत्र हो जाए, तो उसे गृहस्थ का मोह त्यागकर तपस्या, भजन-पूजन व समाज के ऋण से उऋण होने में लग जाना चाहिए।’ वसुदेव जी ने पूछा, ‘ऋषिवर, मुझे क्या करना चाहिए?’ व्यास जी ने बताया, ‘मधुसूदन ने साक्षात आपके पुत्र के रूप में जन्म लिया है- यह आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों का प्रताप है। आप समस्त कर्तव्यों से मुक्त हो चुके हैं। देवऋण से विमुक्त होने के लिए आप प्रतिदिन अग्निहोत्र व पंचयज्ञ करते रहें।’ वसुदेव जी व्यास जी से आशीर्वाद ग्रहण कर कृतकृत्य हो उठे।
उपहार
संत जेरोम जैसा उपदेश देते थे वैसा ही आचरण भी करते थे कथनी और करनी में कोई भेद नहीं था। वह सादगी, सरलता और सात्विकता की साक्षात मूर्ति थे। जेरोम प्रतिदिन अपने हाथों से किसी-न-किसी असहाय-अनाथ व्यक्ति की सेवा अवश्य करते। इतना करने के बावजूद वह हमेशा कहा करते थे, मैं संसार का सबसे बड़ा पापी हूं। जाने-अनजाने अनेक पाप मुझसे होते हैं। ईसा मसीह उनकी इस सरलता से बहुत प्रभावित थे। एक बार क्रिसमस की रात अचानक संत जेरोम की भेंट ईसा मसीह से हो गई। यीशु ने कहा, ‘आज मेरा जन्मदिन है। क्या जन्मदिन का उपहार नहीं दोगे?’ संत जेरोम ने कहा, ‘मेरे पास देने को क्या है भला। मैं अपना हृदय आपको भेंट कर सकता हूं।’ यीशु ने कहा, ‘मुझे आपका हृदय नहीं, कुछ और चाहिए।’ संत ने कहा, ‘वैसे तो, मैं अपना पूरा शरीर आपको भेंट कर सकता हूं। पर मैं पापी हूं। यदि मेरे खजाने में पुण्य होते, तो मैं उन्हें आपको जन्मदिन के उपहारस्वरूप जरूर भेंट कर देता।’ यीशु ने कहा, ‘जब आपके खजाने में पाप ही पाप हैं, तो फिर उन्हें ही मुझे उपहार में दे दें। आप अपना कोई अवगुण मुझे दे दें। मैं आपके तमाम पापों का फल भोग लूंगा।’ यीशु की प्रेमभरी वाणी सुनकर संत जेरोम की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। यीशु ने उन्हें प्यार से गले लगा लिया।
वरदान
राज्यवर्द्धन परम धर्मात्मा तथा प्रजाहितैषी राजा थे। एक दिन रानी मानिनी उनके सिर में तेल लगा रही थीं कि अचानक उन्हें कुछ सफेद बाल दिखे। रानी चिंतित हो उठीं। राजा को जब पत्नी की चिंता का कारण पता चला, तो वह बोले, ‘जन्म लेने के बाद सभी जवान होते हैं और उन्हें बूढ़ा भी होना पड़ता है। इसलिए चिंता कैसी?’ फिर एक दिन राजा ने घोषणा की, ‘हमने पूर्ण धर्मानुसार जीवन बिताया है। प्रजा की सेवा में कोई कसर नहीं रखी। अब बुढ़ापे ने अपनी झलक दिखाकर हमें वन में जाकर साधना करने की प्रेरणा दी है।’ राजा प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। उनका यह निर्णय सुनकर सभी चिंतित हो उठे। सबने राजा से वन न जाने का आग्रह किया, पर वह तैयार नहीं हुए। तब गंधर्व सुदाम ने सुझाव दिया कि भगवान भास्कर को प्रसन्न किया जाए। वह राजा को सैकड़ों वर्षों तक स्वस्थ बने रहने का वरदान दे सकते हैं। राज्य के अनेक लोगों ने कामरूप पर्वत पर जाकर तप शुरू कर दिया। घोर तप के बाद भगवान भास्कर ने दर्शन दिए और सभी से वर मांगने को कहा। प्रजाजनों ने कहा, ‘हमारे राजा को एक हजार वर्ष तक रोग न हो और बुढ़ापा उनसे दूर रहे।’ भगवान भास्कर ने तथास्तु कह दिया। राज्यवर्द्धन को जब यह बताया गया, तो वह बोले, ‘तब तक तो रानी समेत कोई प्रियजन जीवित नहीं रहेगा। भला मैं अकेला जीवित रहकर क्या करूंगा?’ भगवान भास्कर राजा की इस भावना से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा के बंधु-बांधवों तथा प्रजा को भी दीर्घायु होने का वरदान दिया।
परख
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती वर्ष 1872 में धर्म प्रचार के लिए कोलकाता पहुंचे। प्रसिद्ध समाजसेवी व विद्वान केशवचंद्र सेन वहां ब्रह्म समाज के प्रचार-प्रसार में जुटे थे। उन्होंने स्वामी जी की ख्याति सुन रखी थी। स्वामी जी भी केशवचंद्र सेन के विचारों से सुपरिचित थे। एक दिन अचानक श्री सेन स्वामी जी से मिलने जा पहुंचे। बिना परिचय दिए ही उन्होंने वार्ता शुरू कर दी। कुछ देर बाद उन्होंने स्वामी जी से पूछा, ‘कोलकाता आने के बाद क्या केशवचंद्र सेन से मिले।’ स्वामी जी उनकी बातचीत से समझ गए थे कि वही केशवचंद्र हैं। वह बोले, ‘आज ही अभी-अभी मिला हूं। मेरे सामने बैठे हैं वह।’ केशवचंद्र सेन ने पूछा, ‘आपने कैसे पहचान लिया?’ स्वामी जी ने जवाब दिया, ‘विचार व्यक्त करते समय ही मैं समझ गया कि आप कौन हैं।’ केशवचंद्र सेन ने जिज्ञासा व्यक्त की, ‘वेद को आप ईश्वरीय ज्ञान कैसे मानते हैं?’ स्वामी जी ने कहा, ‘असली ज्ञान तार्किक होता है। वेदों में कोई चमत्कारिक घटना नहीं है। वे मानव मात्र के कल्याण का साधन बताते हैं। इसलिए वेद ज्ञान सर्वश्रेष्ठ हैं।’ केशवचंद्र उनके ज्ञान से प्रभावित होकर बोले, ‘यदि आप अंगरेजी जानते, तो मैं आपको अपने साथ धर्म-प्रचार के लिए इंग्लैंड ले जाता।’ स्वामी जी ने कहा, ‘यदि आप अंगरेजी के साथ-साथ संस्कृत जानते, तो आप यहां के लोगों को अपनी बात अच्छे ढंग से समझा सकते थे।’ यह सुनकर सेन मुस्करा उठे। धार्मिक विषयों में मतभेद के बावजूद समाज सुधार के क्षेत्र में दोनों का सहयोग बना रहा।
सेवा-सफाई
महाराष्ट्र के प्रख्यात संत गाड़गे महाराज सेवा कार्य के लिए सदैव तत्पर रहा करते थे। अपने शिष्यों से वह अकसर कहा करते थे कि तीर्थयात्रा का असली पुण्य उन्हें लगता है, जो तीर्थस्थलों की गंदगी दूर करते हैं। तीर्थयात्रियों की सेवा करते हैं। गाड़गे महाराज किसी तीर्थस्थल में पहुंचते, तो वहां झाड़ू से स्वयं सफाई करने लगते। मंदिरों की सीढ़ियां साफ करने में उन्हें अत्यंत संतोष मिलता था। वर्ष 1907 की बात है। गाड़गे महाराज अमरावती के समीप ऋणमोचन तीर्थ में लगने वाले मेले में पहुंचे। उन्होंने नदी के किनारे पड़े पत्तलों व अन्य कूड़े को झाड़ू से हटाकर एक ओर कर दिया। नदी के किनारे एक स्थान पर एकत्रित गंदे जल को अपने साथियों के साथ उलीचकर बाहर निकाला और
जमीन खोदकर नदी की धारा वहां तक पहुंचाई। अचानक गाड़गे जी की मां भी स्नान के लिए वहां आ पहुंचीं। उन्होंने पुत्र को सफाई करते देखा, तो बोलीं, ‘यह काम तो सफाईकर्मी का होता है। तुम क्यों कर रहे हो?’ गाड़गे ने विनयपूर्वक कहा, ‘मां, श्रद्धालुओं की सेवा व पवित्र तीर्थ की सफाई भी भगवान की पूजा-उपासना ही है। मानव भगवान का ही तो रूप है।’ बेटे के श्रद्धा भरे वचन सुनकर मां गद्गद् हो उठी। गाड़गे महाराज ने गांव-गांव पहुंचकर लोगों को मांस-मदिरा का उपयोग न करने तथा सफाई रखने का संकल्प दिलाया।
जमीन खोदकर नदी की धारा वहां तक पहुंचाई। अचानक गाड़गे जी की मां भी स्नान के लिए वहां आ पहुंचीं। उन्होंने पुत्र को सफाई करते देखा, तो बोलीं, ‘यह काम तो सफाईकर्मी का होता है। तुम क्यों कर रहे हो?’ गाड़गे ने विनयपूर्वक कहा, ‘मां, श्रद्धालुओं की सेवा व पवित्र तीर्थ की सफाई भी भगवान की पूजा-उपासना ही है। मानव भगवान का ही तो रूप है।’ बेटे के श्रद्धा भरे वचन सुनकर मां गद्गद् हो उठी। गाड़गे महाराज ने गांव-गांव पहुंचकर लोगों को मांस-मदिरा का उपयोग न करने तथा सफाई रखने का संकल्प दिलाया।
सहनशीलता
भगिनी निवेदिता धर्म, अध्यात्म तथा भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर अपना देश व परिवार छोड़कर भारत आईं। स्वामी विवेकानंद के प्रवचनों ने उन्हें इसके लिए प्रेरित किया था। एक दिन उन्होंने देखा कि स्वामी विवेकानंद किसी जिज्ञासु के प्रश्न का उत्तर देते हुए कह रहे थे कि बेसहारा अनाथ बच्चे साक्षात भगवान के समान हैं। दरिद्रनारायण की सेवा भगवान की सेवा है। भगिनी निवेदिता ने उसी समय संकल्प ले लिया कि वह बंगाल में अनाथ बालक-बालिकाओं के कल्याण के लिए एक आश्रम की स्थापना करेंगी। भगिनी निवेदिता कोलकाता के धनाढ्यों के पास पहुंचकर आश्रम के लिए दान मांगने लगीं। एक दिन वह किसी ऐसे सेठ के पास जा पहुंची,
जो अत्यंत कंजूस था। उसने विदेशी गोरी युवती को दान मांगते देखा, तो कहा, ‘मैंने मेहनत से एक-एक पैसा जोड़ा है। आश्रम-वाश्रम में दान क्यों दूं?’ फिर भी, निवेदिता बार-बार कुछ देने का आग्रह करती रहीं। बार-बार मांगने से सेठ आपा खो बैठा और उसने भगिनी निवेदिता को थप्पड़ जड़ दिया। थप्पड़ खाकर भी उस युवती ने धैर्य के साथ कहा, ‘आपने मुझे थप्पड़ दिया, इसे मैं स्वीकार करती हूं। अब अनाथ बच्चों के लिए भी तो कुछ दीजिए।’ सेठ भगिनी निवेदिता की सहनशीलता और समर्पण देख अपने कृत्य पर पछताने लगा। उसने आलमारी से रकम निकालकर उन्हें भेंट कर दी। साथ ही अपने व्यवहार के लिए उनसे क्षमा भी मांगी।
जो अत्यंत कंजूस था। उसने विदेशी गोरी युवती को दान मांगते देखा, तो कहा, ‘मैंने मेहनत से एक-एक पैसा जोड़ा है। आश्रम-वाश्रम में दान क्यों दूं?’ फिर भी, निवेदिता बार-बार कुछ देने का आग्रह करती रहीं। बार-बार मांगने से सेठ आपा खो बैठा और उसने भगिनी निवेदिता को थप्पड़ जड़ दिया। थप्पड़ खाकर भी उस युवती ने धैर्य के साथ कहा, ‘आपने मुझे थप्पड़ दिया, इसे मैं स्वीकार करती हूं। अब अनाथ बच्चों के लिए भी तो कुछ दीजिए।’ सेठ भगिनी निवेदिता की सहनशीलता और समर्पण देख अपने कृत्य पर पछताने लगा। उसने आलमारी से रकम निकालकर उन्हें भेंट कर दी। साथ ही अपने व्यवहार के लिए उनसे क्षमा भी मांगी।
लोभ
वनवास के दौरान यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से अनेक प्रश्न किए। उनसे एक प्रश्न किया गया कि किन-किन सद्गुणों के कारण मनुष्य क्या-क्या फल प्राप्त करता है और मानव का पतन किन-किन अवगुणों के कारण होता है? युधिष्ठिर ने बताया, ‘वेद का अभ्यास करने से मनुष्य श्रोत्रिय होता है, जबकि तपस्या से वह महत्ता प्राप्त करता है। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह कभी दुखी नहीं होता। सद्पुरुषों की मित्रता स्थायी होती है। अहंकार का त्याग करने वाला सबका प्रिय होता है। जिसने क्रोध व लोभ को त्याग दिया, वह हमेशा सुखी रहता है। कामना को छोड़ने वाला और संतोष धारण करने वाला कभी आर्थिक दृष्टि से दरिद्र नहीं हो सकता।’ कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा,
‘स्वधर्म पालन का नाम तप है। मन को वश में करना दम है। सबको सुखी देखने की इच्छा करुणा है। क्रोध मनुष्य का बैरी है और लोभ असीम व्याधि। जो जीव मात्र के हित की कामना करता है, वह साधु है। जो निर्दयी है, वह असाधु (दुर्जन) है। स्वधर्म में डटे रहना ही स्थिरता है। मन के मैल का त्याग करना ही सच्चा स्नान है।’ युधिष्ठिर ने यक्ष के असंख्य प्रश्नों का उत्तर देकर उसे संतुष्ट कर दिया। धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं सभी सद्गुणों का पालन करते थे। ऐसे अनेक प्रसंग आए, जब वह धर्म के आदेशों पर अटल रहे। अनेक कठिनाइयां सहन करने के बाद भी उन्होंने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा।
‘स्वधर्म पालन का नाम तप है। मन को वश में करना दम है। सबको सुखी देखने की इच्छा करुणा है। क्रोध मनुष्य का बैरी है और लोभ असीम व्याधि। जो जीव मात्र के हित की कामना करता है, वह साधु है। जो निर्दयी है, वह असाधु (दुर्जन) है। स्वधर्म में डटे रहना ही स्थिरता है। मन के मैल का त्याग करना ही सच्चा स्नान है।’ युधिष्ठिर ने यक्ष के असंख्य प्रश्नों का उत्तर देकर उसे संतुष्ट कर दिया। धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं सभी सद्गुणों का पालन करते थे। ऐसे अनेक प्रसंग आए, जब वह धर्म के आदेशों पर अटल रहे। अनेक कठिनाइयां सहन करने के बाद भी उन्होंने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा।
अधर्म

अढाई सौ वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में जन्में योगिराज वनखंडी महाराज परम विरक्त व सेवा भावी संत थे। उन्होंने दस वर्ष की आयु में ही उदासीन संप्रदाय के सिद्ध संत स्वामी मेलाराम जी से दीक्षा लेकर अपना समस्त जीवन धर्म व समाज सेवा के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया था। एक बार पटियाला के राजा कर्मसिंह युवासंत वनखंडी को अपने राजमहल में ले गए। जब उन्होंने उनसे रात को महल में ही निवास करने का आग्रह किया, तो वनखंडी महाराज ने कहा, ‘साधु को किसी भी गृहस्थ के घर नहीं ठहरना चाहिए।’ राजा के हठ को देखकर वह रुक गए और आधी रात को चुपचाप महल से निकलकर वन में जा पहुंचे। संत वनखंडी एक बार तीर्थयात्रा करते हुए असम के कामाख्या देवी के मंदिर के दर्शनों के लिए पहुंचे। उन्हें पता चला कि कुछ अंधविश्वासी लोग देवी को प्रसन्न करने के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि देते हैं। कभी-कभी कुछ दबंग व धनी लोग व्यक्तिगत हित साधने के लिए नरबलि जैसा पाप कर्म करने से भी बाज नहीं आते। वनखंडी महाराज ने निर्भीकतापूर्वक सभी के समक्ष कहा, ‘सभी प्राणीजन देवी मां की संतान हैं। मां करुणामयी होती है, वह किसी की बलि से खुश कैसे हो सकती है।’ उसी दिन से सभी ने संकल्प लिया कि नरबलि जैसा घोर पाप कर्म कभी नहीं होगा। वनखंडी जी सिंध-सक्खर पहुंचे। वहां उन्होंने सिंधु नदी के तट पर उदासीन संप्रदाय के साधुबेला तीर्थ की स्थापना की। यह तीर्थ उनकी कीर्ति का साकार स्मारक है।
बाबा शेख फरीद
बाबा शेख फरीद का जन्म वर्ष 1173 में मुल्तान जिला के खोतवाल गांव में हुआ था। अनेक वर्षों तक हरियाणा के हांसी (हिसार) में रहकर वह खुदा की इबादत में लगे रहे। एक बार उन्होंने देखा कि नया-नया फकीर बना एक युवक किसी से भोजन नहीं मिलने पर गुस्से में गालियां दे रहा है। उस युवा फकीर को शांत करते हुए बाबा ने कहा, ‘खुदा के अलावा किसी से कुछ अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। जो दे, उसका भी भला और जो न दे, उसका भी भला-इस बात को मानकर चलना चाहिए। हृदय में ही खुदा का निवास है। दूसरे को गाली देकर क्या हम दोजख (नरक) में जाने का काम नहीं कर रहे?’ बाबा के शब्दों ने जादू का काम किया और वह युवक उनका शिष्य बन गया। बाबा ने हमेशा ऊंच-नीच की भावना का विरोध किया। उन्होंने लिखा, ‘अय फरीद, जब खालिफ खुलफ के भीतर मौजूद है और उसी में सब कुछ समाया है, तो किसको मंद और नीच समझा जाए।’ फरीद सूफी फकीर थे। उन्होंने फारसी में कविताओं की रचना की। उन्होंने लिखा, वार पराये वेसना साईं मुझे न देई। ईश्वर को छोड़कर किसी की आशा नहीं करनी चाहिए। एक शिष्य की जिज्ञासा का समाधान करते हुए उन्होंने कहा, ‘संतोष, नम्रता, सहनशीलता, ईमानदारी, त्याग और उदारता ऐसे गुण हैं, जो आदमी को खुदा के पास ले जाते हैं।’ जब एक युवक परिवार त्यागकर उनका शिष्य बनने पहुंचा, तो उन्होंने उससे कहा कि वृद्ध माता-पिता, पत्नी व बच्चों का दिल दुखाकर कोई जन्नत नहीं पा सकता। वह युवक वापस लौट गया।
प्रेम की शक्ति
अगर अपने दम पर कोई कुछ परिवर्तन ला सकता है तो वह है प्रेम। प्रेम की शक्ति कुछ भी बदल सकती है। हमारे अवतारों ने, संतों-महात्माओं ने, विद्वानों ने प्रेम पर ही सबसे ज्यादा जोर दिया है। केवल हिंदू धर्म ही नहीं, मुस्लिम, सिख, इसाई, बौद्ध हर धर्म का एक ही संदेश है कि निष्काम प्रेम जीवन में होना ही चाहिए। इसमें बड़ी शक्ति है। यह जीवन की दिशा बदल सकता है। परमात्मा के निकट जाने का एक सबसे आसान रास्ता है प्रेम।
फकीरों की सोहबत में क्या मिलता है यह तो तय नहीं हो पाता है लेकिन कुछ चाहने की चाहत जरूर खत्म हो जाती है। सूफियाना अन्दाज में रहने वाले लोग दूसरों से उम्मीद छोड़ देते हैं। अपेक्षा रहित जीवन में प्रेम आसानी से जागता है। प्रेम में दूसरों को स्वयं अपने जैसा बनाने की मीठी ताकत होती है। प्रेम की प्रतिनिधि है फकीरी। अहमद खिजरविया नाम के फकीर बहुत अच्छे लेखक भी थे। रहते तो फौजियों के लिबास में थे लेकिन पूरी तरह प्रेम से लबालब थे। एक दफा उनके घर चोर ने सेंध लगा दी। चोर काफी देर तक ढूंढता रहा कुछ माल हाथ नहीं लगा। घर तो प्रेम से भरा था अहमद का मन भी पूरी तरह से प्रेम निमग्न था। चोर को वापस जाता देख उन्होंने रोका। कहा हम तुम्हे मोहब्बत तो दे ही सकते हैं बाकी तो घर खाली है। बैठो और बस एक काम करो सारी रात इबादत करो। फकीर जानते थे कि जिन्दगी का केन्द्र यदि ढूंढना हो तो प्रेम के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। जिनके जीवन के केन्द्र में प्रेम है ऊपर वाला उनकी परीधि पर दरबान बनकर खड़े रहने को तैयार होगा। दुनिया में जिन शब्दों का जमकर दुरुपयोग हुआ है उनमें से एक है प्रेम। इसके बहुत गलत मायने निकाले हैं लोगों ने। आइए देखें प्रेम कैसा आचरण करवाता है, यहीं हमें सही अर्थ पता चलेगा। चोर ने सारी रात इबादत की। सुबह किसी अमीर भक्त ने फकीर अहमद खिजरविया को कुछ दीनारें भेजी। फकीर ने दीनारे चोर को दी और कहा यह है तुम्हारी इबादत के एवज में कुबुल करो। चोर प्रेम की पकड़ में था। आंखों में आंसू आ गए और बोला, मैं उस खुदा को भूले बैठा था जो एक रात की इबादत में इतना दे देता है। चोर ने दीनारे नहीं ली और कह गया यहां प्रेम और पैसा दोनों मिले, पर अब प्रेम हासिल हो गया तो बाकी खुद ब खुद आ जाएगा। जिन्दगी में जब प्रेम का प्रवेश रुक जाता तो अशांति को आने की जगह मिल ही जाती है
माता वैष्णोदेवी
पूरे जगत में माता रानी के नाम से जानी जाने वाली माता वैष्णोदेवी का जागृत और पवित्र मंदिर भारत के जम्मू कश्मीर राज्य के उधमपुर जिले में कटरा से १२ किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिमी हिमालय के त्रिकूट पर्वत पर स्थित है। यह एक दुर्गम यात्रा है। किंतु आस्था की शक्ति सब कुछ संभव कर देती है। माता के भक्तों की आस्था और विश्वास के कारण ही ऐसा माना जाता है कि माता के बुलावे पर ही कोई भी भक्त दर्शन के लिए वैष्णो देवी के भवन तक पहुंच पाता है। व्यावहारिक दृष्टि से माता वैष्णो देवी ज्ञान, वैभव और बल का सामुहिक रुप है। क्योंकि यहां आदिशक्ति के तीन रुप हैं - पहली महासरस्वती जो ज्ञान की देवी हैं, दूसरी महालक्ष्मी जो धन-वैभव की देवी और तीसरी महाकाली या दुर्गा शक्ति स्वरुपा मानी जाती है। जीवन के धरातल पर भी श्रेष्ठ और सफल बनने और ऊंचाईयों को छूने के लिए विद्या, धन और बल ही जरुरी होता है। जो मेहनत और परिश्रम के द्वारा ही संभव है। माता की इस यात्रा से भी जीवन के सफर में आने वाली कठिनाईयों और संघर्षों का सामना कर पूरे विश्वास के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रेरणा और शक्ति मिलती है।
कथा - पौराणिक मान्यताओं में जगत में धर्म की हानि होने और अधर्म की शक्तियों के बढऩे पर आदिशक्ति के सत, रज और तम तीन रुप महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने अपनी सामूहिक बल से धर्म की रक्षा के लिए एक कन्या प्रकट की। यह कन्या त्रेतायुग में भारत के दक्षिणी समुद्री तट रामेश्वर में पण्डित रत्नाकर की पुत्री के रुप में अवतरित हुई। लगभग ९ वर्ष की होने पर उस कन्या को जब यह मालूम हुआ है भगवान विष्णु ने भी इस भू-लोक में भगवान श्रीराम के रुप में अवतार लिया है। तब वह भगवान श्रीराम को पति मानकर उनको पाने के लिए कठोर तप करने लगी। जब श्रीराम सीता हरण के बाद सीता की खोज करते हुए रामेश्वर पहुंचे। तब समुद्र तट पर ध्यानमग्र कन्या को देखा। उस कन्या ने भगवान श्रीराम से उसे पत्नी के रुप में स्वीकार करने को कहा। भगवान श्रीराम ने उस कन्या से कहा कि उन्होंने इस जन्म में सीता से विवाह कर एक पत्नीव्रत का प्रण लिया है। किंतु कलियुग में मैं कल्कि अवतार लूंगा और तुम्हें अपनी पत्नी रुप में स्वीकार करुंगा। उस समय तक तुम हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत की श्रेणी में जाकर तप करो और भक्तों के कष्ट और दु:खों का नाश कर जगत कल्याण करती रहो।
इसी प्रकार एक अन्य पुरातन कथा के अनुसार -
वर्तमान कटरा के पास हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम अनुयायी श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक बार उसने नवरात्रि पूजा में कन्या पूजन हेतु कन्याओं को बुलाया। उन कन्याओं के साथ माता वैष्णोंदेवी भी आई। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णोदेवी वहीं रहीं और श्रीधर से कहा कि पूरी बस्ती को भोजन करने का बुलावा दे दो। श्रीधर ने उस कन्या रुपी माँ वैष्णवी की बात मानकर पूरे गांव को भोजन के लिए निमंत्रण देने चला गया। वहां से लौटकर आते समय बाबा भैरवनाथ और उनके शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो सभी को भोजन करवा रही है।
इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णोदेवी ने सभी को भोजन परोसना शुरु किया। भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान-बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रुप में बदलकर त्रिकूट पर्वत की ओर चली गई। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे तू एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे।
भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा के दूसरे मार्ग से बाहर निकली। यह गुफा आज भी अद्र्धकुंवारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रुप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब तक वीर हनुमान ने भैरव से युद्ध किया। भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रुप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। मृत्यु के पूर्व भैरवनाथ ने माता से क्षमा मांगी। तब माता ने उसे माफ कर वर भी दिया कि मेरा जो भी भक्त मेरे दर्शन के बाद भैरवनाथ के दर्शन करेगा उसके सभी मनोरथ पूर्ण होंगे। तब से आज तक अनगिनत माता के भक्त माता वैष्णोंदेवी के दर्शन करने के लिए आते है।
माता का भवन - माता वैष्णों देवी का पवित्र स्थान माता रानी के भवन के रुप में जाना जाता है। यहां पर ३० मीटर लंबी गुफा के अंत में महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा की पाषाण पिण्डी हैं। इस गुफा में सदा ठंडा जल प्रवाहित होता रहता है। कालान्तर में सुविधा की दृष्टि से माता के दर्शन हेतु अन्य गुफा भी बनी हैं।
दर्शनीय स्थान -
माता वैष्णोदेवी के दर्शन के पूर्व माता से संबंधित अनेक दर्शनीय स्थान हैं।
चरण पादुका - यह वैष्णों देवी दर्शन के क्रम में पहला स्थान है। जहां माता वैष्णो देवी के चरण चिन्ह एक शिला पर दिखाई देते हैं।
बाणगंगा - भैरवनाथ से दूर भागते हुए माता वैष्णोदेवी ने एक बाण भूमि पर चलाया था। जहां से जल की धारा फूट पड़ी थी। यही स्थान बाणगंगा के नाम से प्रसिद्ध है। वैष्णोदेवी आने वाले श्रद्धालू यहां स्नान कर स्वयं का पवित्र कर आगे बढ़ते हैं।
अद्र्धकुंवारी या गर्भजून - यह माता वैष्णों देवी की यात्रा का बीच का पड़ाव है। यहां पर एक संकरी गुफा है। जिसके लिए मान्यता है कि इसी गुफा में बैठकर माता ने ९ माह तप कर शक्ति प्राप्त की थी। इस गुफा में गुजरने से हर भक्त जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।
सांझी छत - यह वैष्णोदेवी दर्शन यात्रा का ऐसा स्थान है, जो ऊंचाई पर स्थित होने से त्रिकूट पर्वत और उसकी घाटियों का नैसर्गिक सौंदर्य दिखाई देता है।
भैरव मंदिर - यह मंदिर माता रानी के भवन से भी लगभग डेढ़ किलोमीटर अधिक ऊंचाई पर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि माता द्वारा भैरवनाथ को दिए वरदान के अनुसार यहां के दर्शन किए बिना वैष्णों देवी की यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती है।
वैदिक ग्रंथों में त्रिकूट पर्वत का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा महाभारत में भी अर्जुन द्वारा जम्बूक्षेत्र में वास करने वाली माता आदिशक्ति की आराधना का वर्णन है। मान्यता है कि १४वीं सदी में श्रीधर ब्राह्मण ने इस गुफा को खोजा था।
उत्सव-पर्व -
माता वैष्णो देवी में वर्ष भर में अनेक प्रमुख उत्सव पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाएं जाते हैं।
नवरात्रि - माता वैष्णोदेवी में चैत्र और आश्विन दोनों नवरात्रियों में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। इस काल में यहां पर यज्ञ, रामायण पाठ, देवी जागरण आयोजित होते हैं।
दीपावली - दीपावली के अवसर पर भी माता का भवन दीपों से जगमगा जाता है। यह उत्सव अक्टूबर - नवम्बर में मनाया जाता है। इसी माह में जम्मू से कुछ दूर भीरी मेले का आयोजन होता है।
माघ मास में श्रीपंचमी के दिन महासरस्वती की पूजा भी बड़ी श्रद्धा और भक्ति से की जाती है।
जनवरी में ही लोहड़ी का पर्व और अप्रैल माह में वैशाखी का पर्व यहां बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। जिनमें स्नान, नृत्य और देवी पूजा का आयोजन होता है।
पूजा का समय :-
माता वैष्णो देवी की नियमित पूजा होती है। यहां विशेष पूजा का समय सुबह ४:३० से ६:०० बजे के बीच होती है। इसी प्रकार संध्या पूजा सांय ६:०० बजे से ७:३० बजे तक होती है।
पहुंच के संसाधन -
वायु मार्ग - माता वैष्णोदेवी के दर्शन हेतु सबसे पास हवाई अड्डे जम्मू और श्रीनगर के हैं। रेलमार्ग - रेल मार्ग से वैष्णोदेवी पहुंचने के लिए जम्मूतवी, पठानकोट और अमृतसर प्रमुख रेल्वे स्टेशन है। जहां से कटरा सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है। सड़क मार्ग - वैष्णोदेवी के दर्शन हेतु श्रीनगर, जम्मू, अमृतसर से कटरा पहुंचा जा सकता है। जहां से वैष्णोदेवी का भवन १२ किलोमीटर दूर है।
सलाह - इस स्थान पर दिसम्बर से जनवरी के बीच शून्य से नीचे हो जाता है और बर्फबारी भी होती है। इसलिए यात्रा के लिए उचित समय को चूनें।
निष्काम ध्यान
ओशो अपने भक्तों को एकाग्रचित्त होकर ध्यान करने की प्रेरणा दिया करते थे। एक दिन एक अनुयायी ने उनसे पूछा, ‘महात्मन, डाइनमिक मेडिटेशन करते समय मुझे राहत मिलने की जगह भारी थकान की अनुभूति होने लगी है। छह माह इस विधि से ध्यान करते हो गए, किंतु अभी तक सुखद लक्षण नहीं दिखाई दिए।’
ओशो ने कहा, ‘मैंने पहले ही कहा था कि परिणाम की चिंता न करके पूरी तन्मयता से ध्यान का अभ्यास करो। महीनों में नहीं, तो कभी-कभी कई वर्षों बाद ध्यान के सुपरिणाम सामने आते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म का महत्व बार-बार प्रतिपादित किया है। यदि आदमी निराश प्रवृत्ति का होगा, तो वह थककर बीच में ही सत्कर्म छोड़ भागेगा।’
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, ‘यदि हम सूर्य की रोशनी और ठंडी वायु का आनंद उठाना चाहते हैं, तो हमें कमरे का दरवाजा, खिड़की आदि खोलकर रखनी चाहिए। फिर सूर्य की किरणों व वायु का स्वतः आभास होने लगेगा। कई बार बादलों से आच्छादित रहने के कारण कुछ स्थानों पर महीनों सूर्य के दर्शन नहीं हो पाते। ऐसे में, क्या निराश होकर हमें खिड़की या द्वार हमेशा के लिए बंद कर देने चाहिए? जैसे हम द्वार खोल सकते हैं और सूर्य की किरणों का पहुंचना सूर्य पर निर्भर है, उसी तरह हम ध्यान का अभ्यास निरंतर करते रहें और आशा रखें कि एक न एक दिन हम उससे लाभान्वित होंगे। निराशा छाते ही महीनों के हमारेअभ्यास का श्रम निरर्थक हो जाता है। इसलिए मैं प्रत्येक साधक को निष्काम ध्यान में लगे रहने की प्रेरणा देता हूं
ओशो ने कहा, ‘मैंने पहले ही कहा था कि परिणाम की चिंता न करके पूरी तन्मयता से ध्यान का अभ्यास करो। महीनों में नहीं, तो कभी-कभी कई वर्षों बाद ध्यान के सुपरिणाम सामने आते हैं। इसलिए श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म का महत्व बार-बार प्रतिपादित किया है। यदि आदमी निराश प्रवृत्ति का होगा, तो वह थककर बीच में ही सत्कर्म छोड़ भागेगा।’
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, ‘यदि हम सूर्य की रोशनी और ठंडी वायु का आनंद उठाना चाहते हैं, तो हमें कमरे का दरवाजा, खिड़की आदि खोलकर रखनी चाहिए। फिर सूर्य की किरणों व वायु का स्वतः आभास होने लगेगा। कई बार बादलों से आच्छादित रहने के कारण कुछ स्थानों पर महीनों सूर्य के दर्शन नहीं हो पाते। ऐसे में, क्या निराश होकर हमें खिड़की या द्वार हमेशा के लिए बंद कर देने चाहिए? जैसे हम द्वार खोल सकते हैं और सूर्य की किरणों का पहुंचना सूर्य पर निर्भर है, उसी तरह हम ध्यान का अभ्यास निरंतर करते रहें और आशा रखें कि एक न एक दिन हम उससे लाभान्वित होंगे। निराशा छाते ही महीनों के हमारेअभ्यास का श्रम निरर्थक हो जाता है। इसलिए मैं प्रत्येक साधक को निष्काम ध्यान में लगे रहने की प्रेरणा देता हूं
विद्वान होना जरूरी नहीं
भट्टतिरि भगवान गुरुवायूर के परम भक्त और संस्कृत के प्रकांड ज्ञाता और यशस्वी कवि थे। उन्होंने भगवान गुरवायूर की स्तुति में काव्य रचा। जिसमे सुंदर श्लोको में गुरुवायूर की पावन महिमा का वर्णन था। एक हजार श्लोकों के इस ग्रंथ का नाम नारायणीयम् रखा। पंडित नारायण भट्टतिरि ने गुरुवायूरप्पन जाकर भगवान के मंदिर में स्वरचित श्लोक सुनाए। उन्हें लगा कि भगवान उन्हें प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रहे हैं। नारायणीयम् काव्य की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। लोग कहने लगे कि पंडित नारायण भट्टतिरि से बढ़कर गुरुवायूर का और कोई भक्त नहीं है। गुरुवायूर का एक और भक्त था पूंतानम। वह केवल मलयालम भाषा जानता था। वह ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, किंतु था बिलकुल निश्छल और सरल सात्विक। वह मलयालम में कविताएं लिखता था। एक बार उसने अपने इष्टदेव गुरुवायूर की भक्ति में मलयालम में पद रचे। उन्हें लेकर वह नारायण भट्टतिरि के पास पहुंचा। उसने नारायण को प्रणाम कर कहा, ‘मैंने कुछ भक्ति पद रचे हैं। इन्हें देखने व शुद्ध करने की कृपा करें।’ नारायण ने पूछा, ‘तुम संस्कृत जानते हो?’ पूंतानम द्वारा नहीं कहने पर उन्होंने अहंकार में भरकर कहा, ‘मूर्ख, तुझे यह भी पता नहीं कि भगवान गुरुवायूर केवल संस्कृत में स्तुति किए जाने पर ही प्रसन्न होते हैं? उठाओ अपनी पोथी और भागो यहां से।’ पंडित नारायण जब अन्य दिनों की तरह नारायणीयम् का पाठ करने बैठे, तो उन्हें लगा कि भगवान उनसे कह रहे हैं कि इसमें तो भाषा के अनेक दोष हैं। तुमसे अच्छे गीत तो भक्त पूंतानम सुनाता है। भक्ति गीत सरल मन से लिखे जाते हैं। उसके लिए विद्वान होना जरूरी नहीं। यह इल्म होते ही पंडित नारायण का अहंकार काफूर हो गया। वह भागे-भागे पूंतानम के घर पहुंचे। उसके चरणों में गिरकर उन्होंने माफी मांगी।
भोग-विलास
एक बार दैत्यों ने देवताओं को युद्ध में बुरी तरह पराजित कर दिया। विजयी दैत्य अपने गुरु शुक्राचार्य के पास आशीर्वाद लेने पहुंचे। उन्होंने कहा, ‘गुरुदेव, अब हम तपस्या कर अपने पापों से मुक्ति पाना चाहते हैं। हमारी तपस्या सफल हो, ऐसा आशीर्वाद दीजिए।’ शुक्राचार्य ने कहा, ‘शील एवं संयम त्यागने के कारण ही समाज दैत्यों को घृणा की दृष्टि से देखता है। इसलिए तपस्या के दौरान मर्यादापूर्ण सात्विक जीवन बिताना।’ दैत्य तपस्या में लीन हो गए। दैत्यों की तपस्या की बात सुनकर देवता चिंतित हो उठे। वे भगवान विष्णु के पास पहुंचकर बोले, ‘दैत्यों की तपस्या से यदि आप प्रसन्न हो गए, तो उन्हें मनचाहा वरदान मिल जाएगा। इसलिए तपस्या विफल करने के उपाय बताएं।’ भगवान विष्णु ने उन्हें युक्ति बता दी। देवताओं ने माया मोह नाम के कपटी को तपस्यारत दैत्यों के पास भेजा। दैत्यों ने उसे देखते ही पूछा, ‘आप कौन हैं?’ उसने कहा, ‘मैं माया मोह हूं। आपकी विजय का समाचार सुनकर आपको बधाई देने चला आया हूं।’ कुछ रुककर माया मोह ने दैत्यों से पूछा, ‘आप सब इस जंगल में बैठे क्या कर रहे हैं?’ दैत्य बोले, ‘हम अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए तपस्या कर रहे हैं, ताकि देवता हमें कभी पराजित न कर सकें।’ यह सुनकर माया मोह ने ठहाका लगाया और कहा, ‘तपस्या तो सबसे ज्यादा देवता करते हैं, फिर भी वे पराजित क्यों हो गए? तपस्या से शक्ति कम हो जाएगी। इसलिए आप लोग खाए-पीएं और मौज करें।’ माया मोह की बातें सुनकर दैत्यों की भोगवृत्ति जाग उठी। उन्होंने तपस्या छोड़कर भोग-विलास करना शुरू कर दिया। मौका पाकर देवताओं ने उन पर आक्रमण कर उन्हें पराजित कर दिया। पराजित दैत्य गुरु शुक्राचार्य के पास पहुंचे। शुक्राचार्य ने उनसे कहा, ‘मैंने कहा था कि शील व संयम का त्याग न करना। तपस्या की जगह भोग-विलास में लगने का यह दुष्परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा।’
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