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शनिवार, मई 15, 2010

घोर पाप

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यह सवाल हमेशा कौंधता रहा है कि पाप क्या है और पुण्य क्या है? इससे भी बढ़कर कि पापों में भी महापाप क्या हैं। हर धर्म ने इसकी अपनी व्याख्या की है। जब से मनुष्य ने होश संभाला है तभी से उसमें पाप-पुण्य, भलाई-बुराई, नैतिक-अनैतिक पर मंथन करते आध्यात्मिक विचार मौजूद हैं। सारे धर्म और हर क्षेत में इन पर व्यापक चर्चा होती है। आइए जानें, कि पश्चिमी सभ्यता और क्रिश्चियनिटी मेंं सेवन डेडली सिन्स कहे जाने वाले दुुुनिया के सात महापापों मेंं किन किन बातों को शामिल किया गया है। गौर करके देखें तो इन सारे महापाप की, हर जगह भरमार है और हम में से हर एक इसमें से किसी किसी पाप से ग्रसित है। अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध नाटककार क्रिस्टोफर मारलो ने भी अपने नाटक 'डॉ फॉस्टसमें इन सारे पापों का व्यक्तियों के रूप में चित्रण किया है। ये सात महापाप हैं कामुकता, पेटूपन, लालच, आलस्य, क्रोध, ईष्या और घमंड। कामुकता : उतकुंठा, लालसा, कामुकता, कामवासना यह मनुष्य को दंडनीय अपराध की ओर ले जाते हैं और इनसे समाज में कई प्रकार की बुराईयां फलती है।
पेटूपन : पेटूपन को भी सात महापापों में रखा गया है। हर जमाने में पेटूपन की निंदा हुई है और इसका मजाक उड़ाया गया है। ठूंस कर खाने को महापाप में इस लिए रखा गया है कि इसमें अधिक खाने की लालसा होती है और दूसरी तरफ कई जरूरतमंदों को खाना नहीं मिल पाता।
लालच : यह भी एक तरह से लालसा और पेटूपन की तरह ही है। इसमें अत्यधिक प्रलोभन होता है। चर्च ने इसे सात महापाप की सूची में अलग से इसलिए रखा है कि इस से धन दौलत की लालच शामिल है।
आलस्य : पहले स्लौथ का अर्थ होता था उदासी। इस प्रवृत्ति में खुदा की दी हुई चीज से परहेज किया जाता है। इस की वजह से आदमी अपनी योग्यता और क्षमता का प्रयोग नहीं करता है।
क्रोध : इसे नफरत और गुस्से का मिला-जुला रूप कहा जा सकता जिस में आकर कोई कुछ भी कर सकता है। यह सात महापाप में अकेला पाप है जिसमें हो सकता है कि आपका अपना स्वार्थ शामिल हो।
ईष्र्या : इसमें डाह, जलन भी शामिल है। यह महापाप इस लिए है कि इसमें किसी के गुण या अच्छी चीज को व्यक्ति सहन कर पाता है। ईष्र्या से मन ें संतोष नहीं रहता है।
घमंड : अभिमान को सातों महापाप में सबसे बुरा पाप समझा जाता है। हर धर्म में इसकी कठोर निंदा और भत्र्सना की गई है। इसे सारे पाप की जड़ समझा जाता है क्योंकि सारे पाप इसी पेट से निकलते हैं। इसमें खुद को सबसे महान समझना और खुद से अत्यधिक रेम शामिल है।
जरा सात महापुण्य भी देख लें। ये इस प्रकार हैं-पवित्रता, आत्म संयम, उदारता, परिश्रमी, क्षमा, दया और विनम्रता।
भगवान बुद्ध का पंचशील
बुद्ध ने बनारस के एक धनी व्यापारी यश को शील, सदाचाप के बारे में बताया। जब उसका मन शांत हो गया तो भगवान ने उसे पंचशील का उपदेश दिया।
बुद्ध ने कहा था-
प्राणी हिंसा से विरत रहो।
चोरी मत करो।
अनैतिक व्यवहार मत करो।
व्यभिचार, मिथ्याविचार से विरत रहो।
प्रमादकारी पदार्थों और नशीली चीजों के सेवन से बचो


ज्ञान

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महाराज युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ समाप्त होने पर एक अद्भुत नेवला, जिसका आधा शरीर सुनहरा था, यज्ञ भूमि में लोट-पोट होने लगा वह रुदन करके कहने लगा कि यज्ञ पूर्ण नहीं हुआ सबको बड़ा आश्चर्य हुआ, पूछने पर नेवले ने बताया 'कुछ समय पहले अमुक देश में भयंकर अकाल पड़ा मनुष्य भूख के मारे तड़प-तड़प कर मरने लगे। एक दिन कहीं से अन्न मिलने पर ब्राहमणी ने चार रोटियां बनाईं उस ब्राहमण परिवार का यह नियम था कि भोजन से पूर्व कोई भूखा होता तो उसे पहले उसे भोजन कराया जाता था। एक भूखा चांडाल वहां आया तो ब्राह्मण ने अपने हिस्से की एक रोटी उसे सौंप दी, उसपर भी तृप्त होने के कारण क्रमश: ब्राह्मण की पत्नी और उसके बच्चों ने भी अपना अपना हिस्सा उसे दे दिया जब चांडाल ने भोजन करके पानी पीकर हाथ धोए तो उससे धरती पर कुछ पानी पड़ गया मैं उधर होकर निकला तो उस गीली जमीन पर लेट गया मेरा आधा शरीर ही संपर्क में आया जिससे उतना ही स्वर्णमय बन गया मैंने सोचा था कि शेष आधा शरीर, युधिष्ठिर के यज्ञ में स्वर्णमय बन जाएगा, लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ। राजन! यज्ञ के साथ त्याग बलिदान की अभूतपूर्व परंपरा जुड़ी हुई है।

ध्यान

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मेडिटेशन यानी ध्यान के लिए यूं तो कोई बंधा  नहीं है लेकिन फिर भी श्रेष्ठ परिणाम के लिए समय तय किया जाए तो बेहतर होता है। ध्यान के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है शांति और एकाग्रता। ये दोनों जब सुलभ हों, वह समय ध्यान के लिए सबसे अच्छा होता है। योगी के लिए समय का कोई बंधन नहीं है किंतु नए साधक (अभ्यासकर्ता) के लिए समय की मर्यादा तय की गई है। यह अभ्यास को मजबूत करने के लिए है। निश्चित समय पर ध्यान का अभ्यास करने से न सिर्फ संकल्प शक्ति दृढ़ होती है बल्कि सफलता भी आसान होती है। 
ध्यान के लिए प्रात:, मध्याह्न्, सायं और मध्यरात्रि का समय उचित बताया गया है। इन्हें संधिकाल कहते हैं। संधिकाल यानी जब दो प्रहर मिलते हैं। जैसे प्रात:काल में रात्रि और सूर्योदय, मध्याह्न् में सुबह और दोपहर मिलती है। सबसे उत्तम समय ब्रह्म  मुहूर्त (सूर्योदय से पहले का समय) का है। मान्यता है इस समय ध्यान करने से विशेष लाभ मिलता है। कारण कि रात में नींद पूरी होने से हमारे मन के विकार भी शांत हो चुके होते हैं। नींद से जागते ही ध्यान में बैठने से एकाग्रता बनती है

संत कवि हरिदास

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निरंजनी संप्रदाय के संत कवि हरिदास युवावस्था में कुसंग में पड़कर अपराधों में लिप्त रहने लगे थे। तब उनका नाम हरि सिंह हुआ करता था। एक दिन वह और उनके साथी राहगीरों को लूट रहे थे, तभी एक भगवाधारी साधु वहां से गुजरा। डाकू हरि सिंह ने साधु को रोका। साधु ने कहा, ‘मैं तो मांगकर काम चलाता हूं। साधु को तो वैसे भी छोड़ देना चाहिए।’ हरि सिंह ने कहा, ‘बातें न बना, पोटली खोल।’ साधु ने पोटली खोली। उसमें कुछ रुपये थे। हरि सिंह ने वे रुपये ले लिए। लुटेरों की नजर पोटली में पड़ी एक पुड़िया पर पड़ी, उनमें से एक ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया, तो साधु ने कहा, ‘इसे मत छीनो। यह दवा की पुड़िया है। गांव का एक व्यक्ति मरणासन्न है। मैं उसके लिए यह औषधि लाया हूं।’ हरि सिंह ने साधु के ये शब्द सुने, तो वह हक्का-बक्का रह गए। उन्हें लगा कि यह साधु कितना महान है। इसके हृदय में कितनी दया भावना है। वह साधु के पैरों में गिर पड़े और उसके रुपये वापस करते हुए बोले, ‘बाबा, आज से आप मेरे गुरु हैं। मुझे आशीर्वाद दें कि मैं भविष्य में लूट-मार जैसा अधर्म न करूं।’ साधु ने हरि सिंह को उपदेश देते हुए कहा, ‘बेटा, कभी किसी कुसंगी का साथ न करना। भगवान तुम पर कृपा करेंगे।’ आगे चलकर यही हरि सिंह निरंजनी संप्रदाय के सुविख्यात संत हरिदास निरंजनी के नाम से विख्यात हुए। उन्होंने अनेक भक्ति-पदों की रचना की।

प्रेम

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ईसा के समय की बात है। साल नाम का एक उद्दंड व्यक्ति भोले-भाले मछुआरों व अन्य लोगों को सताया करता था। ईसा के अनुयायियों को वह विशेष रूप से तंग करता था। एक बार ईसा मछुआरों के पास पहुंचे। उन्होंने उन सबको प्रेम से गले लगाया। मछुआरे अपना जाल छोड़कर ईसा के पीछे हो लिए। साल ने यह देखा, तो उसे बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने मछुआरों को और सताना शुरू कर दिया। उनके जाल भी तोड़ दिए। कभी-कभी वह ईसा के शिष्य बने बुनकरों की बस्ती में पहुंच जाता और उनके करघे तोड़ डालता। ईसा को पता चला, तो उन्हें काफी दुख हुआ। उन्होंने प्रार्थना की, ‘साल को सद्बुद्धि मिले।’ साल एक दिन ईसा के सामने आया, तो ईसा ने उसे मुसकराकर देखा। उसे आश्चर्य हुआ कि ईसा को सब पता है, फिर भी उन्होंने क्रोध नहीं किया। वह घर जाकर सो गया। पहली बार उसे नींद नहीं आई। ईसा का प्रेम से सराबोर चेहरा उसे बार-बार दिखाई देता रहा। कुछ देर बाद उसे झपकी आई, तो उसे लगा कि सपने में ईश्वर कह रहे हैं, ‘साल, तुम मुझे क्यों सताते हो?’ साल ने कहा, ‘मैंने आपको कब सताया?’ प्रभु बोले, ‘तुम मेरे भक्त मछुआरों व बुनकरों को सताते हो। वे मुझसे अलग कहां हैं?’ इन शब्दों ने साल की आंखें खोल दीं। वह दूसरे दिन ईसा के पास पहुंचा और उनके पैरों में गिरकर क्षमा मांगी। ईसा ने उसे साल से पॉल बना दिया। आगे चलकर वह ईसा के महान शिष्य ‘सेंट पॉल’ के नाम से विख्यात हुए। 
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'गीतोपदेश' विहंगम दृश्य और झिंझोड़ता सबक....     दोनों तरफ लाखों-करोड़ों की सेना। दोनों ही पक्षों में ऐसे सेकड़ों योद्धा जो अकेले ही युद्ध का परिणाम बदल दें। युद्ध के अंतिम निर्णायक तो श्री कृष्ण ही थे। किन्तु कृष्ण के अतिरिक्त पांडव पक्ष का सारा का सारा दारोमदार अर्जुन पर ही था। वही अर्जुन अचानक मोह और कायरता से ग्रसित यानि कि संक्रमित हो गया। ऐसे में श्री कृष्ण, जो कि अधर्म का विनाश करने ही अवतरित हुए थे को सक्रीय होना पड़ा। लगभग पूरी तरह हताश हो चुके अर्जुन को विष्णु अवतार गोविंद ने इंसानी जिंदगी के जो सूत्र दिये वे आज भी कालजई हैं। महाभारत के उस अद्भुत और अद्वितीय दृश्य से जो अनमोल सबक मिलते हैं, वो इंसान को जिंदगी का महाभारत जीतने का रहस्य दे जाते है:-- स्वयं श्री कृष्ण इंसान को विश्वास दिलाते हैं कि यदि हम न्याय और कर्तव्य के रास्ते पर हैं, तो वो खुद हमारे जीवन रथ की लगाम अपने हाथ मे ले लेंगे।- जीवन है तो संघर्ष भी है। धर्म, न्याय और कर्तव्य की रक्षा के लिये यदि युद्ध भी करना पड़े तो जरूर करना चाहिये।- इंसान को ईश्वर ने संघर्ष करने और शक्तिवान बनने ही भेजा है। संघर्षों से मुक्त सीधी सरल और आसान जिंदगी कोरी कल्पना के सिवाय कुछ भी नहीं।- मोह इंसान को कायर और कमजोर बनाता है अत: इस पर सदैव नियंत्रण रखें।- धर्म, न्याय और कर्तव्यों के लिये जो इंसान, अपनी जान हथेली पर रख कर लडऩे को तैयार हो जाता है उसे धन, मान-सम्मान और प्रसिद्धि अपने आप ही मिल जाती है।- किस्मत हमेशा संघर्ष करने वालों का ही साथ देती हैं। यह सौ फीसदी सत्य है कि भगवान भी उसी की सहायता करता हैं जो स्वयं अपनी मदद करता है

12/6

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1812 नेपोलियन बोनापार्ट ने रूस पर आक्रमण किया। 1830 फ्रांस ने अल्जीरिया का उपनिवेशीकरण प्रारंभ किया। 1898 फिलीपींस ने स्पेन से स्वतंत्नता की घोषणा की। 1940 द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और फ्रांस के 13 हजार सैनिकों ने जर्मनी के फील्ड मार्शल मेजर जनरल इरविन रोमेल के समक्ष आत्मसमर्पण किया। 1982 न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में परमाणु हथियारों के प्रसार के खिलाफ करीब 7 लाख लोगों ने प्रदर्शन किया। 1991 बोरिस येल्त्सिन रूस के राष्ट्रपति बने। 2000 जाने माने मराठी लेखक पीएल देशपांडे का निध

18/6

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1576 महाराणा प्रताप और मुगल बादशाह अकबर के बीच हल्दीघाटी की लड़ाई हुई। 1815 वेलिंगटन व ब्लचर ने वाटरलू की लड़ाई में नेपोलियन बोनापार्ट को हराया। 1941 तुर्की ने जर्मनी के नाजी शासकों के साथ शांति समझौता किया। 1948 संयुक्तराष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने मानवाधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय घोषणा पत्न जारी किया। 1953 अमेरिकी वायुसेना का विमान टोक्यो के पास दुर्घटनाग्रस्त, 129 मरे। 1959 दुनिया की पहली प्रसारण सेवा इंग्लैंड और अमेरिका के बीच शुरू। 1980 भारतीय गणितज्ञा शकुंतला देवी ने 13 अंकों का गुणा 28 सेकंड में करके विश्व रिकॉर्ड बनाया

14/6

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1634 रूस और पोलैंड के बीच पोलियानोव की संधि पर हस्ताक्षर। 1642 अमेरिका में अनिवार्य शिक्षा का पहला कानून मैसाच्युसेट्स में पारित। 1775 अमेरिकी सेना की स्थापना। 1841 ओंटेरियो के किंग्सटन में कनाडा का प्रथम संसद आरंभ। 1907 नार्वे ने महिलाओं से उनका मताधिकार छीना। 1909 स्वतंत्न भारत में प्रथम गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्नी ईएमएस नम्बूदिरीपाद का केरल में जन्म। 1949 वियतनाम स्वतंत्न राष्ट्र बना। बाओ दाई इसके पहले शासक बने। 1953 कोलंबिया में जनरल गुस्ताव रोजस पिनिला ने सैन्य तख्ता पलट किया

अनैतिकता

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आचार्य तुलसी के सत्संग के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचा करते थे। एक बार किसी जिज्ञासु ने उनसे पूछ लिया, ‘परलोक सुधारने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए?’ आचार्यश्री ने कहा, ‘पहले तुम्हारा वर्तमान जीवन कैसा है या तुम्हारा विचार व आचरण कैसा है, इस पर विचार करो। इस लोक में हम सदाचार का पालन नहीं करते, नैतिक मूल्यों पर नहीं चलते और मंत्र-तंत्र या कर्मकांड से परलोक को कल्याणमय बना लेंगे, यह भ्रांति पालते रहते हैं।
आचार्य महाप्रज्ञ प्रवचन में कहा करते थे, ‘धर्म की पहली कसौटी है आचार, और आचार में भी नैतिकता का आचरण। ईमानदारी और सचाई जिसके जीवन में है, उसे दूसरी चिंता नहीं करनी चाहिए।
एक बार उन्होंने सत्संग में कहा, ‘उपवास, आराधना, मंत्र-जाप, धर्म चर्चा आदि धार्मिक क्रियाओं का तात्कालिक फल यह होना चाहिए कि व्यक्ति का जीवन पवित्र बने। वह कभी कोई अनैतिक कर्म न करे और सत्य पर अटल रहे। अगर ऐसा होता है, तो हम मान सकते हैं कि धर्म का परिणाम उसके जीवन में आ रहा है। यह परिणाम सामने न आए, तो फिर सोचना पड़ता है कि औषधि ली जा रही है, पर रोग का शमन नहीं हो रहा। चिंता यह भी होने लगती है कि कहीं हम नकली औषधि का इस्तेमाल तो नहीं कर रहे।
आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आदमी इस लोक में सुख-सुविधाएं जुटाने के लिए अनैतिकता का सहारा लेने में नहीं हिचकिचाता। वह धर्म के बाह्य आडंबरों कथा-कीर्तन, यज्ञ, तीर्थयात्रा, मंदिर दर्शन आदि के माध्यम से परलोक के कल्याण का पुण्य अर्जित करने का ताना-बाना बुनने में लगा रहता है

दोषों से मुक्त

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एक बार ईसा मसीह को एक ऐसे व्यक्ति ने अपने घर आमंत्रित किया, जिसे लोग दुर्व्यसनी होने के कारण घृणा करते थे। ईसा खुशी-खुशी उसके घर पहुंचे, प्रेम से भोजन किया और आशीर्वाद देकर लौट आए। ईसा के शिष्यों ने कहा, ‘आपको समाज से बहिष्कृत व्यक्ति के यहां नहीं जाना चाहि था।ईसा ने उत्तर दिया, ‘अच्छे व्यक्ति तो अच्छे हैं ही, उन्हें उपदेश देने की क्या आवश्यकता है? हमें ऐसे ही व्यक्ति के पास जाना चाहिए, जिसे कुछ बातें बताकर अच्छा बनाया जा सके।

अथर्ववेद में कहा गया है, ‘उत देवा, अवहितं देवा उन्नयथा पुनः। उतागश्चक्रुषं वा देव जीवयथा पुनः॥अर्थात, हे दिव्य गुणयुक्त विद्वान पुरुषो, आप नीचे गिरे हुए लोगों को ऊपर उठाओ। हे देवो, अपराध और पाप करने वालों का उद्धार करो। हे विद्वानो, पतित व्यक्तियों को बार-बार अच्छा बनाने का प्रयास करो। हे उदार पुरुषो, जो पाप में प्रवृत्त हैं, उनकी आत्मज्योति को जागृत करो।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि घर-बार त्यागकर साधु बने व्यक्ति का परम धर्म है कि वह जिस समाज से प्राप्त भिक्षा से प्राणों की रक्षा करता है, उस समाज के लोगों को भक्ति और सेवा का उपदेश देता रहे। लोगों को प्रेरणा देकर ही साधु समाज के ऋण से उऋण हो सकता है। दुर्व्यसनों में लिप्त लोगों के दुर्गुण छुड़वाना, उन्हें सच्चा मानव बनाने का प्रयास करना साधु का कर्तव्य है। यह कार्य वही संत कर सकता है, जो स्वयं दुर्व्यसनों से मुक्त हो। परमहंस जी स्वयं दोषों से मुक्त थे, इसलिए वह पतितों के आमंत्रण को स्वीकार करने में नहीं हिचकिचाते थे।

संयम

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हमारे ऋषि-मुनियों तथा धर्मशास्त्रों ने संकल्प को ऐसा अमोघ साधन बताया है, जिसके बल पर हर क्षेत्र में सफलता पाई जा सकती है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘दृढ़ संकल्पशील व्यक्ति के शब्दकोश में असंभव शब्द नहीं होता। लक्ष्य की प्राप्ति में साधना का महत्वपूर्ण योगदान होता है। संकल्प जितना दृढ़ होगा, साधना उतनी ही गहरी और फलदायक होती जाएगी।’
शास्त्र में कहा गया है, ‘अमंत्रमक्षरं नास्ति-नास्ति मूलमनौसधम्। अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः।’
यानी ऐसा कोई अक्षर नहीं है, जो मंत्र न हो। ऐसी कोई वनस्पति नहीं, जो औषधि नहीं हो। ऐसा कोई पुरुष नहीं है, जो योग्य न हो। प्रत्येक शब्द में मंत्र विद्यमान है, उसे जागृत करने की योग्यता होनी चाहिए। प्रत्येक वनस्पति में अमृत तुल्य रसायन विद्यमान है, उसे पहचानने का विवेक चाहिए। व्यक्ति में योग्यता स्वभावतः होती है, किंतु उस योग्यता का सदुपयोग करने का विवेक होना चाहिए।
साधना को लक्ष्य से जोड़कर मानव अपनी योग्यता का उपयुक्त लाभ उठा सकता है। दृढ़ संकल्प और साधना के बल पर मानव नर से नारायण भी बन सकता है। प्रमाद, अहंकार, असीमित आकांक्षाएं मनुष्य को दानव बना सकती हैं। और इस तरह वे उसके पतन का कारण हैं। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में सत्संग, सात्विकता, सरलता, संयम, सत्य जैसे दैवीय गुणों को जीवन में ढालकर निरंतर अभ्यास-साधना करते रहने का उपदेश दिया है। संयम का पालन करते हुए साधना में रत रहने वाला व्यक्ति निश्चय ही अपने सर्वांगीण विकास में सफल होता है

विनयशीलता

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विख्यात दार्शनिक बेंजामिन फ्रेंकलिन ने सभी धर्म-संप्रदायों की बारह श्रेष्ठ चीजों, जैसे अहिंसा, सत्य, सद्भाव, मौन आदि का चयन कर जीवन में उनका पालन करने का संकल्प ले लिया। वह प्रतिदिन आकलन करते कि क्या उस दिन उन सद्गुणों का पालन किया गया? कुछ ही दिनों में वह अहंकारग्रस्त होकर सोचने लगे कि शायद ही कोई इतने नियमों का पालन करता होगा। एक दिन उन्हें एक संत मिले। वह हर क्षण ईश्वर की याद में खोए रहते थे। वह परम विरक्त थे और सांसारिक सुख-सुविधाओं की उन्हें लेशमात्र भी चाह नहीं थी। फ्रेंकलिन उस संत के प्रति अनन्य श्रद्धा भावना रखते थे।

संत से लंबे अरसे बाद उनकी भेंट हुई थी। संत ने पूछा, ‘वत्स, क्या तुम तमाम समय अध्ययन, उपदेश और लेखन में ही व्यस्त रहते हो या कभी-कभी उसे भी याद करते हो, जिसने तुम्हें इस संसार में भेजा है?’ फ्रेंकलिन ने गर्व से कहा, ‘महात्मन, मैं बारह नियम व्रतों की साधना कर चुका हूं। उनका दृढ़ता से पालन कर रहा हूं। मैं शपथपूर्वक कह सकता हूं कि शायद ही किसी ने इतने नियमों का पालन व्रत लिया हो।’

संत समझ गए कि इस दार्शनिक को अपने नियम पालन का अहंकार हो गया है। उन्होंने कहा, ‘मेरे बताए तेरहवें नियम व्रत का पालन शुरू कर दो। जीवन सफल हो जाएगा। वह है, विनयशीलता और विनम्रता।’ संत के शब्द सुनते ही फ्रेंकलिन के ज्ञान-चक्षु खुल गए। उन्हें लगा कि वास्तव में विनम्रता, व संवेदनशीलता ही तो समस्त गुणों का शील प्राण है। उस दिन से फ्रेंकलिन ने तुच्छ भाव से अपने हृदय में झांकना शुरू कर दिया

चरित्र

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धर्मशास्त्रों में शील (चरित्र) को सर्वोपरि धन बताया गया है। कहा गया है कि परदेश में विद्या हमारा धन होती है। संकट में बुद्धि हमारा धन होती है। परलोक में धर्म सर्वश्रेष्ठ धन होता है, परंतु शील ऐसा अनूठा धन है, जो लोक-परलोक में सर्वत्र हमारा साथ देता है।

कहा गया है कि शीलवान व्यक्ति करुणा एवं संवेदनशीलता का अजस्र स्रोत होता है। जिसके हृदय में करुणा की भावना है, वही सच्चा मानव कहलाने का अधिकारी है। संत कबीर भी शील को अनूठा रत्न बताते हुए कहते हैं-
सीलवंत सबसों बड़ा, सील सब रत्नों की खान
तीन लोक की संपदा, रही सील में आन॥

सत्य, अहिंसा, सेवा, परोपकार, ये शीलवान व्यक्ति के स्वाभाविक सद्गुण बताए गए हैं। कहा गया है कि ‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’ यानी, मानव भगवान का अंशावतार है। अतः उसे नर में नारायण के दर्शन करने चाहिए। दीन-दुखियों की सेवा करने वाला, अभावग्रस्तों व बीमारों की सहायता करने वाला मानो साक्षात भगवान की ही सेवा कर रहा है। निष्काम सेवा को धर्मशास्त्रों में निष्काम भक्ति का ही रूप बताया गया है।

स्वामी विवेकानंद तो सत्संग के लिए आने वालों से समय-समय पर कहा करते थे, ‘आचरण पवित्र रखो और दरिद्रनारायण को साक्षात भगवान मानकर उसकी सेवा-सहायता के लिए तत्पर रहो। लोक-परलोक, दोनों का सहज ही में कल्याण हो जाएगा।’ हम अपनी शुद्ध और बुद्ध आत्मा से अनाथों, निर्बलों, बेसहारा लोगों की सेवा करके पितृऋण, देवऋण और आचार्य ऋण से मुक्त हो सकते हैं।

मदद

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गीतोपदेश' विहंगम दृश्य और झिंझोड़ता सबक....     दोनों तरफ लाखों-करोड़ों की सेना। दोनों ही पक्षों में ऐसे सेकड़ों योद्धा जो अकेले ही युद्ध का परिणाम बदल दें। युद्ध के अंतिम निर्णायक तो श्री कृष्ण ही थे। किन्तु कृष्ण के अतिरिक्त पांडव पक्ष का सारा का सारा दारोमदार अर्जुन पर ही था। वही अर्जुन अचानक मोह और कायरता से ग्रसित यानि कि संक्रमित हो गया। ऐसे में श्री कृष्ण, जो कि अधर्म का विनाश करने ही अवतरित हुए थे को सक्रीय होना पड़ा। लगभग पूरी तरह हताश हो चुके अर्जुन को विष्णु अवतार गोविंद ने इंसानी जिंदगी के जो सूत्र दिये वे आज भी कालजई हैं। महाभारत के उस अद्भुत और अद्वितीय दृश्य से जो अनमोल सबक मिलते हैं, वो इंसान को जिंदगी का महाभारत जीतने का रहस्य दे जाते है:-- स्वयं श्री कृष्ण इंसान को विश्वास दिलाते हैं कि यदि हम न्याय और कर्तव्य के रास्ते पर हैं, तो वो खुद हमारे जीवन रथ की लगाम अपने हाथ मे ले लेंगे।- जीवन है तो संघर्ष भी है। धर्म, न्याय और कर्तव्य की रक्षा के लिये यदि युद्ध भी करना पड़े तो जरूर करना चाहिये।- इंसान को ईश्वर ने संघर्ष करने और शक्तिवान बनने ही भेजा है। संघर्षों से मुक्त सीधी सरल और आसान जिंदगी कोरी कल्पना के सिवाय कुछ भी नहीं।- मोह इंसान को कायर और कमजोर बनाता है अत: इस पर सदैव नियंत्रण रखें।- धर्म, न्याय और कर्तव्यों के लिये जो इंसान, अपनी जान हथेली पर रख कर लडऩे को तैयार हो जाता है उसे धन, मान-सम्मान और प्रसिद्धि अपने आप ही मिल जाती है।- किस्मत हमेशा संघर्ष करने वालों का ही साथ देती हैं। यह सौ फीसदी सत्य है कि भगवान भी उसी की सहायता करता हैं जो स्वयं अपनी मदद करता है
 
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