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रविवार, मई 02, 2010

हिमाचल निर्माता डा0 यशवंत सिंह परमार

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आज हिमाचल निर्माता डा0 यशवंत सिंह परमार की पुण्य तिथि है! हिमाचल प्रदेश को अस्तित्व लाने और विकास की आधा्रशिला रखने में डा0 यशवंत सिंह परमार का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लगभग 3 दशकों तक कुशल प्रशासक के रुप में जन जन की भावनाओं संवेदनाओं को समझते हुए उन्होने प्रगति पथ पर अग्रसर होते हुए हिमाचल प्रदेश के विकास के लिए नई दिशाएं प्रस्तुत की। उनका सारा जीवन प्रदेश की जनता के लिए समर्पित रहा वे उम्र भर गरीबों और जरुरतमंदों की सहायता करते रहे। सिरमौर जिला के चनालग गांव में 4 अगस्त 1906 को जन्मे डा0 परमार का जीवन संघर्षशिल व्यक्ति का जीवन रहा । उन्होने 1928 में बी0ए0 आनर्स किया  लखनउ से एम०ए० और एल०एल०बी०  तथा 1944 में समाज शास्त्र में पी एच डी की।  1929-30 में वे थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य रहे । उन्होने  सिरमौर रियासत में 11 वर्षों तक सब जज और मैजिसट्रेट (1930- 37)  के बाद जिला और सत्र न्यायधीश (1937 -41) के रुप में अपनी सेवाए दी।  वे नौकरी की परवाह ना करते हुए सुकेत सत्याग्रह प्रजामण्डल से जुड़े! उनके ही प्रयासों से यह सत्याग्रह सफल हुआ।  1943 से 46 तक वे सिरमौर एसोसियेशन के सचिव, 1946 से 47 तक हिमाचल हिल स्टेट कांउसिल के प्रधान, 1947 से 48 तक सदस्य आल इन्डिया पीपुलस कान्फ्रेस  तथा प्रधान प्रजामण्डल सिरमौर संचालक सुकेत आन्दोलन से जुड़े रहे। डा0 परमार के प्रयासों से ही 15 अप्रेल 1948 को 30 सियासतों के विलय के बाद हिमाचल प्रदेश बन पाया और 25 जनवरी 1971 को इस प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला।
1948 से 52 सदस्य सचिव हिमाचल प्रदेश चीफ एडवाजरी काउंसिल, 1948 से 64 अध्यक्ष हिमाचल कांग्रेस कमेटी,  1952 से 56 मुख्य मंत्री हिमाचल प्रदेश, 1957 सांसद बने और 1963 से 24 जनवरी 1977 तक हिमाचल के मुख्य मंत्री पद पर कार्य करते रहे किया!डा0 परमार ने पालियेन्डरी इन द हिमालयाज, हिमाचल पालियेन्डरी इटस शेप एण्ड स्टेटस, हिमाचल प्रदेश केस फार स्टेटहुड और हिमाचल प्रदे्श एरिया एण्ड लेगुएजिज नामक शोध आधारित पुस्तके भी लिखी। डा0 परमार  की सादगी और प्रदे्श के प्रति इमानदारी इसी बात से पता चलती है कि 17 वर्षों तक मुख्यमन्त्री पद पर कार्य करने के बावजूद मरणोपरान्त उनके बैंक खाते में मात्र 563 रुपये थे। डा0 परमार 2 मई 1981 को स्वर्ग सिधार गए। आज उनकी पुण्य तिथि पर हम हिमाचल वासी उन्हे उनके योगदान के लिए याद कर रहे है।

शनिवार, अप्रैल 10, 2010

महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन की 107 वीं जयंति

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 हिमाचल साहित्यकार सहकार सभा ने आज 9 अप्रेल को महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन की 107 वीं जयंति पर बिलासपुर में साहित्यक सभा का आयोजन किया! तीन सत्रों मे आयोजित इस सभा में सांस्कृत्यायन के व्यकितत्व और कृतित्व पर विचार विमर्श हुआ तथा लेखक गोष्ठी, पत्र वाचन और कवि पाठ क आयोजन किया गया! आयोजन के मुख्यातिथि थे हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड के सचिव प्रभात शर्मा और कार्यक्रम की अध्य्क्षता हिमाचल के व्योवृद्ध वरिष्ठ रचनाकार संत राम शर्मा ने की! इस अवसर पर बिलासपुर की ज़िला भाषा अधिकारी डा० अनिता शर्मा भी उपस्तिथ थी!
लेखक गोष्ठी में साहित्य्कात सभा के अध्यक्ष रतन चंद निर्झर ने राहुल सांस्कृत्यायन के हिमाचल पर लेखन पर विवेचना की और मन्डी के जगदीश कपूर ने  विवेचना पर अपने विचार व्यक्त किये!  आयोजन के दूसरे चरण में हिमाचल पत्रकार संघ के अध्यक्ष जय कुमार ने हिमाचल के साहित्य की प्रगति पर अपना पत्र वाचन किया!
तीसरे चरण में काव्य पाठ का आयोजन किया गया! इस सत्र में देहरादून के  तेज पाल नेगी, चण्डीगढ़ के रतन चंद रत्नेश, आलमपुर कांगडा़ के प्रीतम आलमपुरी, चम्बा के अशोक दर्द, हमीरपुए के नरेश राणा, सुंदरनगर के सुरेश सेन निशांत और पवन चॊहान, पद्दर मंडी के कृष्ण चंद महादेविया, मंडी के जगदीश कपूर, सोलन के प्रो० नरेन्द्र अरुण, बल्देव चॊहान ने काव्य पाठ किया जबकि बिलासपुर के  स्थानिय कवियों मेम अनुप मस्ताना, सुशील पुंडेर, रतन चंद निर्झर, प्रदीप गुप्ता, अरुण डोगरा रितु, रवि सांख्यायन, जगदीश जमथली, शक्ति उपाध्याय, राम लाल पुंडीर, कु० सुरभि शर्मा और स्वंत्रता सैनानी के० एल० दबड़ा ने काव्य पाठ किया!
इसी आयोजन में हिमाचल साहित्यकार सहकार सभा ने प्रतिवर्ष 9 अप्रेल को सांस्कृत्यायन जयंति पर साहित्यिक आयोअजन करने, और उनके सम्मान में साहित्यिक पुरस्कार शुरु करने और क्षेत्रिय स्तर पर हिमाचल साहित्यकार सहकार सभा के आयोजन करने  के निर्णय लइये गये ! सभा ने हिमाचल विधान सभा में पहाडी़ बोली के विकास के निर्णय पर खुशी जाहिर करते हुए सरकार का अभार व्यक्त किया गया!
सभा का निकट भविष्य में सहयोगी आधार पर काव्य और लघु कथा संकलन निकालने की योजना है! सभा का पता है
रतन चंद निर्झर, 
अध्यक्ष, हिमाचल साहित्यकार सहकार सभा,
मकान न० 210, रौड़ा सेक्टर 2,
बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश

फोटो साभार : जनोक्ति 

बुधवार, मार्च 31, 2010

बड़ु साहिब

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हिमाचल प्रदेश के सिरमौर ज़िला में राजगढ़ से 29  किलोमीटर दूर बड़ु साहिब: तपोभूमि, संतो की स्थली और शिक्षा के विस्तार की स्थली बन गई है! यहां जाने का मौका  मुझे 1995 में मिला उस समय किसी काम से राजगढ़ गया तो बड़ु साहिब जाने का अवसर मिला! बड़ु साहिब पर मेरा पहला लेख चण्डीगढ़ से प्रकाशित होने वले अखवार दैनिक ट्रिब्यून हिंदी में 24  जुलाई 1995  को छ्पा था!  तब से लेकर अब तक यहां अभूतपूर्व विकास हुआ है! 
बड़ु साहिब के तपोभूमि बनने की भविष्यवाणी लगभग 90 साल पहले ही हो गई थी ।  इस स्थली में संतो के चमत्कार भी इतिहास में दर्ज है । बडू साहिब का गुरूद्वारा, गुरू की स्तुति के लिए पूर्ण हो चुका है । जिसकी बाहरी सजावट देखते ही बनती है! बड़ु साहिब के प्रमुख कार्यक्रताओं से जानकारी लेते समय जान्कारी मिली की सजावट पर 30 करोड रूप्ये खर्च होने का अनुमान था लेकिन  इस राशि को शिक्षा के विस्तार पर खर्च करने का फैसला किया है ।
 यहाँ  पहले कच्चा गुरूद्वारा  पक्का सिक्ख हुआ करता था । 1986 में कलगीधर ट्रस्ट के अंतगर्त 5 स्कूल थे जिनकी संख्या अब बढकर 70 तक पहुंच गई है । इस ट्रस्ट की उतर भारत में 2012 तक 200 स्कूल खोलने की योजना है जिनकी संख्या 2020 तक 500 तक  बढाई जायेगी! बड़ु सहिब में 1960 से ही लंगर का आयोजन किया गया जा रहा है! 
 मान्यता है की  संत अतर सिंह ने अपने अनुयायियों को 18वीं सदी के अंत में इस स्थली को ढूंढने की बात कही थी । वर्तमान स्थली कभी जोगेन्द्र सिंह की मलकियत होती थी जिसे जोगेन्द्र सिहं ने संतो को सौंप दिया था । 1906 में सन्तो ने इस बात की भविष्यवाणी कर दी थी कि इस स्थली पर शिक्षा का अभूतपूर्व विकास होगा । इस स्थली को गौतम ऋषि, गुरू गोविद सिंह व गुरू नानक देव का आर्शीवाद भी प्राप्त है ।
 बड़ु साहिब में आध्यात्मिक तरीके से इस स्थान पर नशा मुक्ति केन्द्र भी संचालित किया जा रहा है । अढाई सौ बिस्तरों के अस्पताल में मरीजों का उपचार मुफ्त किया जा रहा है । हर साल 4 निःशुल्क कैम्पों के आयोजन के लिए डेढ करोड रूप्ये की राशि खर्च की जाती है ।  बडू साहिब में निर्मित गुरूद्वारें में 10 हजार श्रद्धालुओं के एक साथ बैठने की व्यवस्था है । साथ ही इस स्थान पर  युनिवर्सिटी की स्थापना भी की जा रही है ।
 बड़ु साहिब का वर्तमान स्वरुप हर किसी को आश्चर्य चकित कर देता है कि जंगल के बीच सन्तो के आर्शीवाद से यह धर्मस्थल बन पाया जो आज आस्था का केन्द्र बन गया है! सतनाम वाहेगुरु का पवित्र उदघोष आत्मिक शांति प्रदान करता है! शहरों की भागदोड़ से दूर यह सथल पुनः आने का आमंत्रण स्वतः ही देता है!

सोमवार, मार्च 29, 2010

गल सुणा

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वैसे तो सभी भाषाओं और बोलिओं में ब्लोग लिखे जा रहे है! हिमाचल प्रदेश से भी अनेक लोग हिन्दी और अंग्रेजी में ब्लोगिंग कर रहे है! परंतु पहाड़ी बोली में कोई भी नहीं लिख रहा था! आज मेल खोली तो चिठाजगत की नये चिठों बारे मेल देखी! नये ब्लोगों पर यात्रा करते समय जानकारी मिली की पहाड़ी बोली में भी ब्लोग लेखन शुरु कर दिया गया है! खुशी हुई ! गल सुणा नाम से ब्लोग बना है और उम्मीद की जानी चाहिए कि गल सुणा क्षेत्र विशेष में ना रह कर पूरे हिमाचल की संस्कृति को उभारेगा! जिज्ञासा वश लेखक के परिचय तक पहुंचा तो वह अधुरा मिला ! लेखक को शुभकामनायें !

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

मुर्गे के पंख से ईंधन

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अमेरीका में भारतीय मूल के प्रोफ़ेसर मनोरंजन मनो मिश्रा मुर्गे के पंख और कॊफी से ईंधन बना कर सुर्खियों में है! उन्हे इस काम के लिये सम्मानित भी किया गया है! श्री मिश्रा को नेवादा सिस्टम आफ हायर एजुकेशन बोर्ड ने वर्श 2010 की रिजेंट्स रिसर्चर उपाधि से सम्मानित किय है! वे नेवादा विश्वविद्यालय के रेनो रिन्युअल एनर्जी सेंटर के निदेशक है! श्री मिश्रा 1998  से संकाय के सदस्य है! वे अब तक पेटेंट के 10 शोधपत्र प्रकाशित कर चुके है! अभी 12 शोधपत्र प्रकाशित करेगे! श्री मिश्रा सौर हाइड्रोजन हाइड्रोजन भंडारण और सेंसर प्रोद्योगिकी में मह्त्वपूर्ण काम कर चुके है!उन्होने पेयजल से आर्सेनिक अवयव को हटा कर प्रसिद्दी पाई है! श्री मिश्रा शोध क्षेत्र में अनेक महत्व पूर्ण कार्य कर रहें है !
 
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