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शनिवार, फ़रवरी 27, 2010

तुलसी

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आयुर्वेद में तुलसी को अमृत माना गया है! वैद्यों का मनाना है की अगर प्रतिदिन प्रात:काल बासी मुहं तुलसि का पता चबा कर खाया जाये तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है! तुलसि के रस में संक्रामक रोगो को खत्म करने कि क्षमता हॊती है! काली मिर्च के साथ तुलसी की पत्ती को पीस कर प्रतिदिन सेवन करने से दांतों का दर्द दूर हो जाता है! तुलसी के सेवन कर्णशूल मूत्र संबंधी अनेक बीमारियां दूर होती है!

शुक्रवार, फ़रवरी 26, 2010

प्राकृतिक रोशनी

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एक शोध के अनुसार धूप की पूरी मात्र ना मिलने के कारण  युवा देर तक सोने के आदी बन रहे है ! वास्तव में नीद की समस्या मेलाटोनिन  हारमोनों की कमी के  कारण होती है जो हमें प्राकृतिक रोशनी से प्राप्त होती है ! आलस बने रहने से युवाओं की क्षमता भी प्रभावित होती है !


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हींग तेरे क्या क्या रंग!

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हींग गर्म तीक्ष्ण वात कफ़ और शूल को नष्ट करती  है और पित प्रकोपक होती है! यह रस मे कटु और उष्ण वीर्य होती है ! भोजन में रुचि उत्पन्न करती है! हींग को सौंफ़ के अर्क में देने से मूत्रावरोध में लभ होता है! हींग को पानी घोल कर नाक में उसकी बूंदे ढालने से आधा सीसी रोग में आराम मिलता है! हींग को पानी में उबाल कर इस पानी से कुल्ले करने से दांत का दर्द दूर होता है! अथवा दांत के पीले भाग मेम हींग भरने से दन्तकृमि नष्ट हो जाते है और दांत की पीड़ा मिट जाती है! हींग के सेवन से गर्भाशय की शुद्धि होती है मासिक धर्म साफ और समय से होने लगता है ! उदर वेदना को मिटाता है! निम्न चूर्ण को बना कर सेवन करने से अनेक रोगों में लाभ देने वाल होता है ! घी में सेंकी हुई हींग और काली मिर्च सेंधा नमक अजवाईन ज़ीरा सफेद और शाह ज़ीरा को समभाग में मिला कर चूर्ण बनाये ! थोड़ा चुर्ण भोजन से पूर्व खाने से अजीर्ण वायु हैजा आदि रोगों में आराम मिलत है! गर्म पानी के साथ मटर के बराबर हींग निगल जाने से उदरशूल अतिसार हिचकी और उल्टी में शीघ्र आराम मिलता है! कब्जियत के पुराने रोगियों के लिये हींग लाभदायक होत है! पेट दर्द होता हो तो हींग को थोड़े से पानी में मिला कर नाभि के आसपास और पेट पर इसका लेप लगाने से आराम मिलता है! बच्चों के पेत मरोड़ हो रहा हो तो नाभि के ऊपर लेप लगाने से बच्चे को आराम मिल जाता है ! हींग तो हींग है इसके क्या कहने.......
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शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2010

ठोडा

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ठोडा हिमाचल  प्रदेश के कुछ जिलों में विशेष अवसरों पर खेला जाने वाला संगीतमय खेल है ! तीर कमान के प्रदर्शन के  इस खेल को महाभारत काल से जोड़ कर भी देखा जाता है ! माना जाता है की ठौड़ा की उत्पति महाभारत काल में हुई थी! इसे पांडवों और कोरवों के मध्य हुए युद्ध के रूप में देखा जाता है ! ठौड़ा दल में दो दल होते है जिन्हें पाषंड   और शाठंड  कहा जाता है ! पाषंड को पांडव और शाठंड को कोंरव का रूप माना जाता है! प्रदेश के गाँव में होने वाले मेलों में ठौड़ा दलों को प्रदर्शन के लिए बुलाया जाता है ! दल एक विशेष प्रकार की सफ़ेद पोशाक पहनता है ! हिमाचल प्रदेश के उपरी इलाको ठियोग और चोपाल क्षेत्रो तथा सिरमौर के राजगड क्षेत्र में मेलों के अवसर पर ठौड़ा खेल का आयोजन किया जाता है ! ठौड़ा को ये दल अपने स्तर पर ही जिन्दा रखे हुए है जो सराहनीय है !
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