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बुधवार, जून 08, 2011

श्रीखण्ड यात्रा 2011

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Shrikhand Mahadev
श्रीखण्ड सेवा दल और स्थानीय प्रशासन ने वर्ष 2011 में श्रीखण्ड यात्रा की तिथि की घोषणा कर दी है। सभी शिव भक्तजनों को यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता होगी कि हर साल की भांति इस वर्ष भी 16वीं बार श्रीखण्ड महादेव कैलाश यात्रा 15 जुलाई 2011 (श्रावण संक्रांति) से शुरू होने जा रही है और श्रीखण्ड सेवादल के तत्वावधान में यह यात्रा 23 जुलाई 2011 तक चलेगी। इस अवधि में 15 से 22 जुलाई तक श्रीखण्ड सेवादल द्वारा सिंहगाड से प्रतिदिन प्रातः 5 बजे यात्रा के लिए विधिवत जत्था रवाना किया जाएगा। 
यह स्थान समुद्रतल से लगभग 18000 फुट(5155 मीटर) की ऊंचाई पर है जिस कारण यहां मौसम ठण्डा रहता है। अतः यात्रियों से अनुरोध है कि अपने साथ, गर्म कपड़े, कम्बल, छाता, बरसाती व टार्च साथ लाएं। इस यात्रा की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ व प्लास्टिक के लिफाफे साथ न लाएं। यात्रियों से निवेदन है कि पूर्ण रूप से स्वस्थ होने पर ही इस यात्रा में भाग लें। श्रीखण्ड सेवादल कोई सरकारी सहायता प्राप्त संस्था नहीं है, सारा आयोजन सदस्यों के सहयोग से किया जाता है।

आप रामपुर बुशहर (शिमला से 130 किलोमीटर) से 35 किलोमीटर की दूरी पर बागीपुल या अरसू सड़क मार्ग से पहुँच सकते हैं। बागीपुल से 7 किलोमीटर जाँव तक गाड़ी से पहुँचा जा सकता है। जाँव से आगे की यात्रा पैदल होती है। यात्रा के तीन पड़ाव सिंहगाड़ , थाचडू और भीम डवार है। जाँव से सिंहगाड़ तीन किलोमीटर, सिंहगाड़ से थाचडू आठ किलोमीटर की दूरी और थाचडू से भीम डवार नौ किलोमीटर की दूरी पर है। यात्रा के तीनों पड़ाव में श्रीखण्ड सेवादल की ओर से यात्रियों की सेवा में लंगर (निशुल्क भोजन व्यवस्था ) दिन रात चलाया जाता है। भीम डवार से श्रीखण्ड कैलाश दर्शन सात किलोमीटर की दूरी पर है तथा दर्शन उपरांत भीम डवार या थाचडू वापिस आना अनिवार्य होता है।
Shrikhand Mahadev
श्रीखंड महादेव यात्रा के दौरान भक्त जन निरमंड क्षेत्र के कई दर्शनीय स्थलों का भ्रमण भी कर सकते हैं। इस क्षेत्र के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल हैं-

प्राकृतिक शिव गुफा देव ढांक, प्राचीन एवं पौराणिक परशुराम मन्दिर, दक्षिणेश्वर महादेव व अम्बिका माता मन्दिर निरमंड, संकटमोचन हनुमान मन्दिर अरसू, गौरा मन्दिर जाँव, सिंह गाड, ब्राह्टी नाला, थाच्डू, जोगनी जोत, काली घाटी, ढांक डवार, कुनशा, भीम डवार, बकासुर वध, दुर्लभ फूलों की घाटी पार्वती बाग़, माँ पार्वती की तपस्थली नैन सरोवर, महाभारत कालीन विशाल शिलालेख भीम बही।

रविवार, मई 29, 2011

तानु जुब्‍बड़ मेला 30 मई

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                                                                                                       शिमला जिला में नारकंडा ब्लाक के तहत ग्राम पंचायत जरोल में स्थित तानु जुब्बढ़ झील एक सुंदर पर्यटक स्थल है। यहाँ नाग देवता का प्राचीन मन्दिर हैं ! यह झील नारकंडा से 9 किलो मीटर दूर समुद्रतल से 2349 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है ! इस झील का एक पुरातन इतिहास रहा है ! इतनी ऊंचाई पर समतल मैदान के बीचो बीच आधा किलोमीटर के दायरे लबालब पानी से भरी इस झीलं को देख कर हर कोई सोच में पड़ जाता है ! जुब्बढ़ का स्थानीय भाषा में अभिप्राय है घास का मैदान ! इस झील की खोज का श्रेय उन भेड़ बकरी पलकों को जाता है जो यहाँ भेड़ और बकरियों को यहाँ चराने आते थे ! समतल मैदान होने के कारण इन पशु पालकों ने यहाँ पर खेती करने की सोची ! खेती करते समय उन पशु पालकों को यहाँ ठंडे इलाके के बाबजूद सांप नज़र आते थे ! वे उन साँपों को मरने का प्रयास करते तो वो वही पर लुप्त हो जाते थे ! इतना होने पर भी वे पशु पालक वहां पर खेती करते रहे ! एक दिन खेती करते समय एकाएक 18 जोड़ी बैल मैदान के मध्य छिद्र हो जाने से वहा उत्पन हुई जलधारा में समां गए ! इस जलधारा से मैदान पानी से पूरा भर गया ! मान्यता है की इस दृश्य को देखने वाले अभी हैरान परेशां ही थे की वहा नाग देवता जी की प्रतिमा उभर आई ! लोगों ने इसे देव चमत्कार मानते हुए नाग देवता की स्थापना यहाँ कर दी ! आज भी नाग देवता का मंदिर यहाँ पर आलोकिक है और लोगो में बेहद मान्यता है !

उस समय उस चमत्कार में गायब हुए चरवाहे औए बैल सैंज के समीप केपु गाँव में निकले ! यह सब केसे हुआ इसे देव चमत्कार ही माना जाता है !इसके प्रमाण आज भी केपु के मंदिर में देखे जा सकते है !
हर वर्ष यहाँ पर मई मास में 31तारीख के आस पास मेले का आयोजन किया जाता है जो की लगभग तीन दिनों तक चलता है इस मेले में चतुर्मुखी देवता मेलन मेले की शोभा बढाते है ! इस मेले में दूर दूर से श्रद्धालु दर्शनों के लिए आते है ! स्थानीय स्थाई निवासी इस मेले में ज़रूर शिरकत करते है। झील के चारो ओर देवदार के वृक्ष इस स्थल की सुन्दरता को और भी बढ़ा देते है ! ठंडी ठंडी हवा वातावरण को और भी सुहावना बना देती है ! इस मेले में खेल कूद प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है जिसमें वोल्ली बाल क्रिकेट इत्यादि प्रतियोगिता प्रमुख है !
कुछ भी कहा जाये परन्तु आज भी पुरातन काल में हुए इन चमत्कारों के प्रमाणों को देख कर लोग चकित रह जाते है ! इस क्षेत्र का प्राकृतिक सोंदर्य अद्भुत तो है ही और पर्यटकों को आकर्षित भी करता है ! आवश्यकता है इस क्षेत्र को और अधिक विकसित करने की क्योंकि यहाँ पर्यटन की आपार संभावनाएं है !

शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

ग़ज़ल

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पत्ते जीवन के कब बिखर जाए क्‍या मालूम
शाम जीवन की कब हो जाए क्‍या मालूम

बन्‍द हो गए है रास्‍ते सभी गुफतगू के
अब वहां कौन कैसे जाए क्‍या मालूम

झूठ पर कर लेते है विश्‍वास सब
सच कैसे सामने आए क्‍या मालूम

दो मुहें सापों से भरा है आस पास
दोस्‍त बन कौन डस जाए क्‍या मालूम

विक्षिप्‍त की दुनिया है बेतरतीव बेरंग
कोई संगकार सजा जाए क्‍या मालूम

मंगलवार, मार्च 08, 2011

महिला दिवस

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आज अन्‍तरराष्‍ट्रीय महिला दिवस है। सौ वर्षो पुरानी इस परम्‍परा का आरम्‍भ बीसवीं शताब्‍दी में ही हो गया था। 1908 में न्‍यूयार्क सिटी में कामकाजी महिलाओं ने अपनी मांगों को लेकर रैली का आयोजन किया था।  यह प्रयास  महिलाओं को वोट का अधिकार देने के लिए किया गया था।पहला महिला दिवस  मनाने की घोषणा 28 फरवरी 1909 को अमेरिकी समाजवादी पार्टी ने की थी।   इसके बाद इसे फरवरी के अन्तिम रविवार को मनाया जाने लगा। 1910 में कोपेनहेगन के सोशलिस्‍ट इंटरनेशनल के सम्‍मेलन में इसे अंतर्राष्‍ट्रीय दर्जा दिया गया।  1917 मे रूस की महिलाओं ने महिला दिवस पर रोटी कपड़ा के लिए हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया । जो एक ऐतिहासिक निर्णय था। ग्रेगेरियन कैंलेण्‍डर के अनुसार यह दिन 8 मार्च का था और इसलिए इस दिन को महिला दिवस के रूप में घोषित किया गया।  संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ने 1975 को महिला वर्ष घोषित किया था और इस दिवस को आधिकारिक स्‍वीकृति प्रदान की गई थी।

गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

हिमप्रस्‍थ का जनवरी 2011

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हिमप्रस्‍थ के जनवरी 2011 के अंक में डा0 अम्बिका घेजटा का लेख सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना की कविताओं में ग्रामिण बोध की अभिव्‍यक्ति पठनीय लेख है। इसके अतिरिक्‍त प्रो0 डा0 यशवंतकर संतोष कुमार का लेख भारतीय समाजशास्‍त्र संग्रहीय लेख है। अन्‍य लेख में सुदर्शन वशिष्‍ठ, राजेन्‍द्र राजन, आंकाक्षा यादव, सीता राम गुप्‍ता, जितेन्‍द्र कुमार, डा0 शशि भूषण, सत्‍यनारायण भटनागर, और बी0डी0 शर्मा के आलेख महत्‍वपूर्ण है। डा0 मदन मोहन वर्मा की कहानी स्‍वतंत्र है अब हम प्रभावित करती है। अन्‍य कहानियों में डा0 लीला मोदी और साधु राम दर्शक की कहानियां पठनीय है। इस अंक में डा0 सुरेश उजाला और अंकुश्री की लघुकथाओं के साथ साथ राम नारायण हलधर, राजीव कुमार त्रिगर्ती, महेन्‍द्र सिंह शेखावत उत्‍साही, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, ज्ञान चन्‍द शर्मा, डा0 जगदीश चन्‍द्र शर्मा और शंकर सुल्‍तानपुरी की कवितायें पठनीय है। सुरेश आनन्‍द का व्‍यंग्‍य सुबह का भविष्‍यफल पठनीय है। हिमप्रस्‍थ के इस अंक में डा0 रमेश सोबती ने सुकृति भठनागर के काव्‍य संग्रह अनुगूंज और डा0 जगन सिंह ने डा0 अरूण कुमार की पुस्‍तक पालिटिकल मार्केटिंग इन इण्डिया की समीक्षा प्रस्‍तुत की है।
सम्‍पर्क :संपादक, रणजीत सिंह राणा, हिमप्रस्‍थ सम्‍पादकीय कार्यालय, हि0प्र0 प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चौकी, शिमला -171005
 
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