मंगलवार, अगस्त 03, 2010
बुधवार, जुलाई 21, 2010
पाबला जी
लगभग एक माह तक अपने ब्लाग पर कुछ भी नहीं लिख पाया । इस दौरान पत्नी की अस्वस्थता के कारण चण्डीगढ़ था। आज जब नेट पर आया तो पाबला जी की दुर्घटना की खबर पढ़ी। जान कर दुख हुआ। आशा है पाबला जी अब ठीक होंगे। पाबला जी से मात्र एक बार फोन पर बात हुई है और उन्होने मार्गदर्शन किया था।पाबला जी के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना करता हूं।
शनिवार, जुलाई 17, 2010
परम शांति
महर्षि सनतकुमार और देवर्षि नारद सत्संग कर रहे थे। सनतकुमार ने प्रश्न किया, ‘देवर्षि, आपने किन-किन शास्त्रों और विद्याओं का अध्ययन किया है?’ नारद जी ने उन्हें बताया कि उन्होंने वेदों, पुराणों, वाकोवाक्य देवविद्या, ब्रह्मविद्या, नक्षत्र विद्या आदि का अध्ययन किया है। पर उनका ज्ञान मात्र पुस्तकीय है। नारद जी ने विनयपूर्वक महर्षि से ब्रह्मविद्या का ज्ञान कराने की प्रार्थना की। महर्षि सनतकुमार ने उपदेश देते हुए बताया, ‘वाणी, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, प्राण आदि पंद्रह तत्वों को जानना चाहिए। सत्य, मति कर्मण्यता निष्ठा तथा कर्तव्यपरायणता आदि का ज्ञान प्राप्त करने से आत्मिक सुख मिलता है।’ उन्होंने कहा, ‘सच्चा सुख तो परमात्मा की सर्वव्यापकता की अनुभूति होने पर ही प्राप्त होता है। इस अनुभूति के होने पर मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि सारा संसार ही उसका परिवार है-वसुधैव कुटुंबकम्। जब हमारा दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है, तो हम प्राणी मात्र में अपने परमात्मा के दर्शन कर सभी के प्रति सुहृद के समान व्यवहार करते हैं।’ धर्मशास्त्रों में कहा गया है, ‘परमात्मा सर्वत्र है। वह सर्वशक्तिमान है। वह नित्य, पवित्र और प्रेम का प्रतीक है। जिसे परमात्मा के प्रति असीम निश्छल प्रेम की अनुभूति होने लगती है, उसका हृदय-मन पूरी तरह सांसारिक आसक्ति से रहित हो जाता है। जीव जब संसार की वासनाओं और क्षणिक आकर्षणों में भटककर थक जाता है, तब उसे परमात्मा की शरण में जाकर ही परम शांति व सुख प्राप्त होता है।’ |
अहंकार
राजगृह के कोषाध्यक्ष की पुत्री भद्रा बचपन से ही प्रतिभाशाली थी। माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध विवाह कर लिया। विवाह के बाद उसे पता चला कि वह युवक दुर्व्यसनी और अपराधी किस्म का है। एक दिन उस युवक ने भद्रा के तमाम आभूषण कब्जे में ले लिए और उसकी हत्या का प्रयास किया। पर भद्रा ने युक्तिपूर्वक अपनी जान बचा ली। इस घटना ने उसमें सांसारिक सुख से विरक्ति की भावना पैदा कर दी। वह भिक्षुणी बन गई। अल्प समय में ही उसने शास्त्रों का अध्ययन कर लिया और उसकी ख्याति विद्वान साध्वियों में होने लगी। भद्रा को अहंकार हो गया कि वह सबसे बड़ी शास्त्रज्ञ है। उसने पंडितों को शास्त्रार्थ के लिए ललकारना शुरू कर दिया। एक बार वह श्रावस्ती पहुंची। उसे पता चला कि अग्रशावक सारिपुत्र प्रकांड पंडित माने जाते हैं। भद्रा ने सारिपुत्र को शास्त्रार्थ की चुनौती दे डाली। उसने सारिपुत्र से अनेक प्रश्न किए, जिसका सारिपुत्र ने जवाब दे दिया। अंत में सारिपुत्र ने उससे प्रश्न किया, ‘वह सत्य क्या है, जो सबके लिए मान्य हो?’ भद्रा यह सुनते ही सकपका गई। पहली बार उसने किसी विद्वान के समक्ष समर्पण करते हुए कहा, ‘भंते, मैं आपकी शरण में हूं।’ सारिपुत्र ने उत्तर दिया, ‘मैं बुद्ध की शरण में हूं, उनका शिष्यत्व ग्रहण करो।’ भद्रा बुद्ध के पास पहुंची। बुद्ध ने उसे उपदेश देते हुए कहा, ‘देवी, किसी भी प्रकार का अहंकार समस्त सद्कर्मों व पुण्यों को क्षीण कर देता है। धर्म के केवल एक पद को जीवन में ढालो कि मैं ज्ञानी नहीं, अज्ञानी हूं।’ तथागत के शब्दों ने भद्रा को पूरी तरह अहंकारशून्य बना दिया
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