मंगलवार, जून 22, 2010
विनम्रता और दया
सत्संग के लिए आने वालों से संत कबीर अकसर कहा करते थे कि अपने काम को पूरी लगन से करते हुए भगवान का चिंतन करते रहना चाहिए। एक दिन एक श्रद्धालु कबीर के दर्शन के लिए आया। उसने उनसे कहा, ‘बाबा आप तो दिन भर बैठे करघे पर कपड़ा बुनते रहते हैं। फिर भला भगवान का ध्यान-स्मरण कब कर लेते हैं?’ कबीर उसे अपने साथ लेकर गंगा तट पर पहुंचे। एक महिला गंगाजल से भरा गागर अपने सिर पर रखे लौट रही थी। गागर को उसने पूरी तरह छोड़ रखा था और मुंह से गंगा की महिमा के गीत गुनगुना रही थी। लेकिन गागर से एक बूंद भी गंगाजल नहीं छलक रहा था। कबीर उसकी तरफ इशारा करते हुए बोले, इस महिला को ध्यान से देखो। यह मुंह से गंगा का- भगवान का स्मरण कर रही है और इसे यह भी पूरा ध्यान है कि गागर गिर न पाए। दोनों काम एक साथ साधना इस महिला से सीखो। मैं भी हाथों से करघा चलाता हूं, और ऐसा करते हुए मुख से राम नाम जपता रहता हूं। परमात्मा का नाम तो हर क्षण भक्त के हृदय व मन में रमते रहना चाहिए।’ कबीर के इस उपदेश से जिज्ञासु की समस्या का समाधान हो गया। संत कबीर धर्म के नाम पर पनपने वाले आडंबर के घनघोर विरोधी थे। उन्होंने अपनी साखियों में अभिमान में अंधे, ढोंगी-नशेड़ी साधुओं पर काफी कठोर लहजे में प्रहार किए थे। अपने को चमत्कारी साधु या गुरु बताने वाले अहंकारी साधुओं पर उन्होंने लिखा, घर-घर मंतर देत फिरत हैं, महिमा के अभिमाना/ गुरु सहित शिष्य सब बूड़ें, अंत काल पछताना। कबीरदास का मत था कि वही साधु-महात्मा सच्चा गुरु कहलाने का अधिकारी है, जो स्वयं सदाचारी, संयमी और ज्ञानी है। जिसके मन में विनम्रता और दया का वास नहीं है, वह आखिर गुरु कैसे हो सकता है।
सोमवार, जून 21, 2010
परम संतोष
धृतराष्ट्र समय-समय पर महात्मा विदुर के सत्संग के लिए लालायित रहा करते थे। वह जानते थे कि विदुर जो सलाह देते हैं, वह पूर्णतया धर्मसम्मत होती है। वह उनके कटु लगने वाले वचनों को भी कल्याणकारक मानते थे। एक दिन विदुर जी ने धृतराष्ट्र को उपदेश देते हुए कहा, ‘राजन, केवल धर्म ही कल्याणकारक है। एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। विद्या ही परम संतोष देने वाली है। काम, क्रोध और लोभ, मनुष्य के पुण्य का नाश करने वाले नरक के तीन दरवाजे हैं। अतः हर हाल में इनका त्याग करना चाहिए।’ जब उन्होंने देखा कि धृतराष्ट्र पुत्रमोह में सत्य की अवहेलना कर रहे हैं, तो विदुर जी ने कहा, ‘जैसे नदी के पार जाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है, उसी प्रकार स्वर्ग के लिए सत्य ही एकमात्र सोपान है।’ विदुर जी जानते थे कि मोह के कारण ही धृतराष्ट्र पतन को प्राप्त होंगे। इसलिए वह उनसे अकसर कहते, ‘जैसे सूखी लकड़ी में मिल जाने से गीली लकड़ी भी जल जाती है, ठीक उसी तरह दुष्टों का त्याग न करने और उनके साथ मिले रहने से निरपराध सज्जनों को भी दंड भोगना पड़ता है, इसलिए दुर्व्यसनी एवं अहंकारी का साथ तुरंत त्याग देना चाहिए। किसी के मोह में पड़कर दूसरे के साथ अन्याय घोर अधर्म है। आप कौरवों और पांडवों के साथ समान रूप से कोमलता का व्यवहार कीजिए। ऐसा करने से आपको इस लोक में सुयश तो प्राप्त होगा ही, मृत्यु के बाद स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी।’ विदुर को श्रीकृष्ण का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त था। भगवान श्रीकृष्ण भी उनकी धर्मपरायणता तथा भक्ति भावना के कायल थे।
आदरणीय पाबला जी
आज लम्बे समय के बाद मेल खोली तो खाते को
| Unknown | | 12 Jun |
रविवार, जून 20, 2010
विनम्रता
शिक्षाविद और राजनेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1952 में भगवान बुद्ध के दो प्रधान शिष्यों सारिपुत्त और महमोग्गलामने के पवित्र भस्मावशेष लेकर म्यांमार गए थे। उसके बाद कंबोडिया के बौद्ध धर्मावलंबियों ने उन्हें अपने देश में आमंत्रित किया। कंबोडिया की राजधानी नॉमपेन्ह में आयोजित बौद्ध महासम्मेलन में उन्होंने कहा, ‘भगवान बुद्ध सनातन धर्मियों द्वारा दशावतार के रूप में पूजे जाते हैं। धर्म के नाम पर प्रचलित ऊंच-नीच की कुप्रवृत्ति के उन्मूलन में उनका योगदान सराहनीय है। उनके इस ऋण से हम कभी उऋण नहीं हो सकते।’ बौद्ध धर्म व दर्शन पर उनका भाषण सुनकर सभी प्रभावित हुए। सम्मेलन में उपस्थित कंबोडिया के एक बौद्ध लामा डॉ. मुखर्जी की श्रद्धा-भावना देखकर भाव-विह्वल हो उठे। वह मुखर्जी के पास पहुंचे और यह कहकर उनके पैरों की ओर झुके कि आप हमारे भगवान बुद्ध की पावन जन्मभूमि में जन्मे हैं, इसलिए हमारे लिए श्रद्धा भाजन हैं। इस पर मुखर्जी ने उन्हें रोकते हुए कहा, ‘आप भिक्षु हैं और हमारी संस्कृति में साधु-संतों के चरण स्पर्श करने की परंपरा है।’ यह कहते-कहते वह तुरंत उनके चरणों में झुक गए। डॉ. मुखर्जी जैसे अग्रणी नेता की इस विनम्रता को देखकर सभी हतप्रभ रह गए। डॉ. मुखर्जी परम धार्मिक व्यक्ति और विनम्रता की मूर्ति थे। 23 जून, 1953 को श्रीनगर में नजरबंदी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। नजरबंदी काल में भी प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के बाद ही वह अन्न-जल ग्रहण करते थे
बुधवार, जून 16, 2010
साफ-सफाई
विश्व, खासकर विकासशील देशों के सामने स्वच्छ जल और साफ-सफाई की कमी एक बड़ी चुनौती है। यूनीसेफ के अनुसार, विश्व में जलजनित बीमारियों के कारण हर १५ सेकंड में एक बच्चे की मौत हो रही है। इस स्थिति से बचने के लिए जरूरी है कि स्वच्छ जल संभव हो, तो उबला हुआ पानी का सेवन करें।
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